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प्राकृतिक इंजीनियरिंग का कमाल, मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज

Saba Naaz
2 July 2026 4:58 PM IST
प्राकृतिक इंजीनियरिंग का कमाल, मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज
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Business: हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश में बदलते जलवायु चक्र और तेजी से बढ़ते पर्यटन के बीच पर्यावरण और पारिस्थितिकी को बचाने की चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य की प्राकृतिक सुंदरता जितनी प्रसिद्ध है, उतनी ही तेजी से यहां की जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बढ़ रहा है। इसी बीच मेघालय के ‘लिविंग रूट ब्रिज’ और वहां के सफल सामुदायिक संरक्षण मॉडल ने एक नया रास्ता दिखाया है, जिससे प्रेरणा लेकर अब हिमाचल प्रदेश भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।

मेघालय में लंबे समय से चल रहे सामुदायिक संरक्षण मॉडल ने यह साबित किया है कि जब स्थानीय समुदाय और सरकार मिलकर काम करते हैं, तो प्रकृति और विकास के बीच संतुलन संभव है। यहां विकास केवल बड़े निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी भी शामिल है। इसी सोच को अब हिमाचल में भी अपनाया जा रहा है, जहां पर्यावरण संरक्षण को विकास नीति का हिस्सा बनाया जा रहा है।

मेघालय में सामुदायिक और सरकारी एजेंसियां मिलकर जल संरक्षण, पर्यटन, शिक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं। जंगलों को सुरक्षित रखकर जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया जा रहा है, पर्यटन को ‘विरासत पर्यटन’ की दिशा दी जा रही है और स्कूलों में बच्चों को स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में जागरूक किया जा रहा है। इसके अलावा, भूस्खलन जैसे आपदाओं की पहचान में भी स्थानीय ज्ञान का उपयोग किया जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां मेघालय से भिन्न हैं, लेकिन सामुदायिक संरक्षण का मूल सिद्धांत समान है। यहां पहले से ही ‘वन पंचायतें’ और स्थानीय समितियां वनों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कई क्षेत्रों में ‘पवित्र उपवनों’ के माध्यम से दुर्लभ औषधीय पौधों और जीव-जंतुओं का संरक्षण किया गया है। अब राज्य में पर्यटन को ‘होमस्टे’ और ‘इको-टूरिज्म’ से जोड़कर स्थानीय लोगों को रोजगार देने और पर्यावरण पर दबाव कम करने की कोशिश की जा रही है।

सामुदायिक संरक्षण मॉडल के तहत चार प्रमुख स्तंभों पर जोर दिया जा रहा है। इसमें स्थानीय पंचायतों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना, पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना, जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देना और सहकारी समितियों के माध्यम से वन उत्पादों का उचित मूल्य सुनिश्चित करना शामिल है। इससे स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ती है और संसाधनों का सतत उपयोग संभव होता है।

मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज को राष्ट्रीय स्तर पर तब पहचान मिली जब प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ में इसका उल्लेख किया। इसे इस बात का उदाहरण बताया गया कि कैसे पारंपरिक ज्ञान आज के जलवायु संकट का समाधान बन सकता है। यह मॉडल यह भी दिखाता है कि जब सरकार और समुदाय बराबरी के साझेदार बनकर काम करते हैं, तभी संरक्षण के बेहतर परिणाम मिलते हैं। मेघालय में ‘नेचर होम्स’ और लर्निंग सेंटर जैसी पहलें भी चलाई जा रही हैं, जहां स्थानीय लोग और युवा पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी जानकारी सीख और साझा कर रहे हैं। यहां 120 से अधिक लिविंग रूट ब्रिज, 25 नर्सरियां और कई पारंपरिक वन मार्गों का पुनरुद्धार किया गया है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है और सतत आजीविका के नए अवसर बने हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सामुदायिक भागीदारी ही संरक्षण की सबसे मजबूत नींव है। जब स्थानीय लोग अपने संसाधनों के संरक्षक बनते हैं, तो परिणाम अधिक प्रभावी और स्थायी होते हैं। हिमाचल प्रदेश में भी अब यही मॉडल आगे बढ़ रहा है। यदि सरकार और स्थानीय समुदाय मिलकर इस दिशा में काम करते हैं, तो हिमाचल न केवल पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण बनेगा, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक रोल मॉडल भी साबित हो सकता है।

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