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ईपीएफ में न्यूनतम पेंशन का सवाल

13 Feb 2024 1:59 AM GMT
ईपीएफ में न्यूनतम पेंशन का सवाल
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एंप्लाइज पेंशन स्कीम (ईपीएस), 1995 के अंतर्गत, ऐसे कर्मचारी जो कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के सदस्य हैं, उनके लिए न्यूनतम पेंशन का प्रावधान पहली बार भारत सरकार द्वारा 1995 में किया गया था, जिसे 2014 में 1000 रुपए प्रतिमाह तक बढ़ा दिया गया, लेकिन कर्मचारी पिछले कुछ समय से मूल पेंशन में वृद्धि करने …

एंप्लाइज पेंशन स्कीम (ईपीएस), 1995 के अंतर्गत, ऐसे कर्मचारी जो कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के सदस्य हैं, उनके लिए न्यूनतम पेंशन का प्रावधान पहली बार भारत सरकार द्वारा 1995 में किया गया था, जिसे 2014 में 1000 रुपए प्रतिमाह तक बढ़ा दिया गया, लेकिन कर्मचारी पिछले कुछ समय से मूल पेंशन में वृद्धि करने और अन्य मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। सभी के लिए ज्यादा पेंशन : ईपीएस स्कीम के तहत अभी सभी कर्मचारियों के लिए 1000 रुपए प्रतिमाह की पेंशन का प्रावधान है। लेकिन मजदूर संगठनों द्वारा बार-बार यह मांग की जा रही है कि सभी सदस्यों को ज्यादा पेंशन का प्रावधान होना चाहिए। अलग-अलग संगठनों ने इसके लिए अलग-अलग पेंशन राशि की मांग की है। इस संबंध में, देश के सबसे बड़े मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ की मांग है कि सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए और पेंशन अंतिम आहरित वेतन का आधा तय किया जाना चाहिए, और ईपीएस कोई अपवाद नहीं होना चाहिए।

अलग-अलग प्रकार की पेंशन : गौरतलब है कि देश में कर्मचारियों के लिए उनके नियोक्ता के हिसाब से अलग-अलग प्रकार की सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं का प्रावधान है। एक तरफ 2004 से पूर्व में नियुक्त सरकारी कर्मचारी हैं, जिन्हें सरकार उनकी पूरी सेवा अवधि के बाद आखिरी वेतन के आधे के बराबर मासिक पेंशन के रूप में प्रदान करती है। 2004 के बाद नियुक्त सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन स्कीम का प्रावधान है, जिसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों द्वारा भविष्य निधि में योगदान दिया जाता है, जिसे नई पेंशन स्कीम के नियमों के अनुसार प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है, और उसी संचित निधि में से योगदान पर आधारित पेंशन देने का प्रावधान है। नई पेंशन स्कीम के अंतर्गत आने वाले सरकारी कर्मचारी भी लंबे समय से पुरानी पेंशन स्कीम के तहत पेंशन की मांग कर रहे हैं और कई राज्य सरकारों ने अपने कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली भी कर दी है। निजी क्षेत्र के कर्मचारी ईपीएफओ के अंतर्गत आते हैं। ईपीएफओ के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों और नियोक्ताओं द्वारा राशि ईपीएफओ में जमा की जाती है और इस प्रकार से हर कर्मचारी द्वारा जमा कुल राशि पर हर साल घोषित ब्याज दर के हिसाब से ब्याज लगाया जाता है। अपने सेवा काल के दौरान जमा की गई राशि और साथ ही ब्याज पर भुगतान सेवानिवृत्ति अथवा नौकरी छोडऩे या छूटने पर कर्मचारी को कर दिया जाता है। वर्ष 1995 से ईपीएफओ के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों को उनकी जमा राशि और ब्याज के अलावा न्यूनतम पेंशन का प्रावधान किया गया और उसे बाद में 1000 रुपए प्रतिमाह तक बढ़ाया गया। इसके बाद कर्मचारियों की लगातार यह मांग रही है कि यह राशि अत्यंत कम है और इसमें वृद्धि होनी चाहिए। यही नहीं, नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा गैर ईपीएफओ कर्मचारियों और मजदूरों एवं स्वरोजगार युक्त छोटे व्यापारियों के लिए नई शुरुआत की गई है।

गैर ईपीएफओ कर्मचारियों और मजदूरों के लिए प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना राष्ट्रीय पेंशन योजना प्रारंभ की गई है एवं व्यापारी और स्वरोजगार युक्त व्यक्तियों के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। इन दोनों योजनाओं में 18 से 40 वर्ष की आयु के बीच के आवेदकों को 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक 55 रुपए से 200 रुपए प्रति माह तक मासिक योगदान करना होगा। एक बार जब लाभार्थी 18-40 वर्ष की प्रवेश आयु में योजना में शामिल हो जाता है, तो लाभार्थी को 60 वर्ष की आयु तक योगदान करना होता है। 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर, ग्राहक को, जैसा भी मामला हो, पारिवारिक पेंशन के लाभ के साथ 3000 रुपए की सुनिश्चित मासिक पेंशन डीबीटी द्वारा प्राप्त होगी। यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी ग्राहक ने लगातार योगदान का भुगतान नहीं किया है, तो उसे सरकार द्वारा तय किए गए दंड शुल्क, यदि कोई हो, के साथ-साथ संपूर्ण बकाया राशि का भुगतान करके अपने योगदान को नियमित करने की अनुमति दी जाएगी। इसके अतिरिक्त सरकारी बैंकों और अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों में सामाजिक सुरक्षा की अलग-अलग व्यवस्था है। यानी कहा जा सकता है कि देश हर कम या ज्यादा सभी आय वर्गों के कर्मचारी और स्वरोजगार युक्त व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षा की विभिन्न प्रकार की रचना देश में बनी हुई है। गौरतलब है कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और स्वरोजगार युक्त लोगों को दी जाने वाली पेंशन का भुगतान मोटे तौर पर तब करना होगा जब वर्तमान में इसके लिए जिन 18 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों ने सदस्यता ली है। यानी इस योजना के लिए राशि का प्रावधान कम से कम 20 वर्ष से पहले नहीं करना पड़ेगा। लेकिन यदि ईपीएफओ के सदस्यों को यदि ऊंची पेंशन देनी पड़े तो उसकी देनदारी तुरंत ही ईपीएफओ के संचित फंड पर पड़ेगी और इतनी पेंशन देने के बाद ईपीएफओ की संचित राशि धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है। ऐसे में ईपीएफओ में अपना योगदान देने वाले कर्मचारियों को भविष्य में उनकी राशि वापस करने में कठिनाई हो सकती है। केंद्र सरकार की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार ईपीएसए 1995 के तहत पेंशन फंड एक एकत्रित फंड है।

पेंशन निधि में, व्यक्तिगत खाते नहीं रखे जाते हैं। ईपीएसए 1995 के सदस्य सेवा के वर्षों की संख्या के आधार पर उनकी पात्रता के आधार पर निकासी लाभ या पेंशन के लिए पात्र हैं। 31.03.2019 तक फंड के एक्चुरियल मूल्यांकन के अनुसार, पेंशन फंड घाटे में है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार द्वारा वर्तमान में नियोक्ता के योगदान के रूप में वेतन के 1.16 प्रतिशत के रूप में लगभग 8000 करोड़ रुपए का योगदान दिया जा रहा है। इसके अलावा न्यूनतम पेंशन के 1000 रुपए के भुगतान के लिए लगभग 1000 करोड़ रुपए का योगदान दिया जा रहा है। इसलिए, न्यूनतम पेंशन राशि बढ़ाए जाने के बाद बजट से बहुत बड़ी राशि की आवश्यकता होगी, और पूरा बोझ केंद्र सरकार पर पड़ेगा। अगर केंद्र सरकार ईपीएफओ में इस पेंशन को बढ़ाने का फैसला लेती है तो उसे उसी अनुपात में इसका बोझ उठाना होगा, इसलिए सरकार को यह फैसला लेने से पहले अपने बजटीय संसाधनों को ध्यान में रखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय : सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2022 के अपने निर्णय में 15 हजार से ऊपर के वेतन वाले कर्मचारियों के लिए, कर्मचारी पेंशन स्कीम 1995 के अंतर्गत यह निर्देश दिया कि ऐसे कर्मचारियों के लिए नियोक्ताओं का योगदान 8.33 प्रतिशत की बजाय 9.49 प्रतिशत रहेगा। इस अतिरिक्त राशि का भुगतान केंद्र सरकार करती है। गौरतलब है कि कर्मचारियों का योगदान इस योजना में वेतन का 12 प्रतिशत रखा गया था। इस संबंध में जिन कर्मचारियों की पात्रता पाई गई, उनके संबंध में उन्हें डिमांड नोटिस जारी कर दिए गए। गौरतलब है कि इस संबंध में विकल्प उन्हीं कर्मचारियों द्वारा भरे जा सकते हैं, जो 1 सितंबर 2014 को अथवा उससे पूर्व सेवा में थे। इस संबंध में 17.5 लाख आवेदन प्राप्त हुए हैं। गौरतलब है कि सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का ऊंची पेंशन देने का निर्णय सभी कर्मचारियों के लिए नहीं माना गया था। कर्मचारियों को पेंशन में वृद्धि हेतु कुछ समय तो लग सकता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि पेंशन राशि के संबंध में सरकार कर्मचारियों के पक्ष में सोच रही है।

डा. अश्वनी महाजन

कालेज प्रोफेसर

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