लोहे के फेफड़े के सहारे 70 साल जीने वाली महिला का निधन।

Update: 2026-07-12 09:45 GMT

वाशिंगटन: चिकित्सा इतिहास और मानवीय इच्छाशक्ति की एक अद्भुत मिसाल रहीं मार्था लिलार्ड अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 'आयरन लंग' (लोहे के फेफड़े) नामक विशाल वेंटिलेटर मशीन के सहारे सात दशकों से अधिक समय तक जीवित रहने वाली आखिरी अमेरिकी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड का 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनकी छोटी बहन सिंडी मैकवे ने मीडिया को इस दुखद खबर की जानकारी देते हुए बताया कि मार्था ने ओक्लाहोमा में 26 जून को अंतिम सांस ली। मार्था लिलार्ड दुनिया के उन चुनिंदा और अमेरिका के आखिरी ऐसे व्यक्ति के रूप में जानी जाती थीं, जो आधुनिक वेंटिलेटर के दौर में भी अपनी जान बचाने के लिए इस ऐतिहासिक और भारी-भरकम मशीन पर पूरी तरह निर्भर थीं।

मार्था लिलार्ड की जीवन यात्रा केवल 5 वर्ष की कोमल आयु में ही पूरी तरह बदल गई थी, जब उन्हें जानलेवा और अपंग बना देने वाली बीमारी पोलियो ने अपनी चपेट में ले लिया था। साल 1953 में हुए पोलियो के इस गंभीर हमले ने उनके फेफड़ों की मांसपेशियों को पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया था, जिससे वे खुद से सांस लेने में असमर्थ हो गई थीं। उस दौर में डॉक्टरों ने उन्हें जीवित रखने के लिए 'आयरन लंग' नाम की एक बेलनाकार धातु की मशीन में रखा, जो हवा के दबाव को नियंत्रित कर कृत्रिम रूप से उनके फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाती थी। तब डॉक्टरों ने उनके परिवार से निराशा जताते हुए कहा था कि मार्था शायद 20 साल से ज्यादा नहीं जी पाएंगी। लेकिन मार्था ने डॉक्टरों की तमाम आशंकाओं को अपनी अद्वितीय इच्छाशक्ति और जीने के जज्बे से गलत साबित कर दिया।

मार्था की बहन सिंडी मैकवे ने उन्हें याद करते हुए भावुक शब्दों में कहा कि भले ही डॉक्टरों ने उनकी उम्र बेहद कम बताई थी, लेकिन मार्था के भीतर जीने और अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी जिंदगी को सबसे बेहतरीन बनाने का एक गजब का जोश था। वह एक जिंदादिल इंसान थीं जिन्होंने कभी भी इस बड़ी मशीन को अपनी मानसिक स्वतंत्रता के आड़े नहीं आने दिया। सिंडी ने मार्था की मौत के कारणों पर बात करते हुए बताया कि वे लंबे समय तक रहने वाले 'लॉन्ग कोविड-19' (Covid-19) के गंभीर दुष्प्रभावों से जूझ रही थीं, जिसके चलते उनके शरीर के अन्य अंगों ने धीरे-धीरे काम करना बंद कर दिया था।

आयरन लंग तकनीक 20वीं सदी के मध्य में पोलियो महामारी के चरम के दौरान हजारों बच्चों की जान बचाने वाली एक क्रांतिकारी चिकित्सा खोज थी। जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान ने प्रगति की और पोलियो की वैक्सीन के आने से यह बीमारी लगभग समाप्त हो गई, वैसे-वैसे इन मशीनों का उपयोग भी बंद हो गया। आधुनिक समय में पोर्टेबल और हल्के वेंटिलेटर आ गए, लेकिन मार्था ने अपनी सुविधा और आदत के कारण इस ऐतिहासिक मशीन को ही प्राथमिकता दी। वे इसके भीतर घंटों बिताती थीं, जिससे उन्हें सांस लेने की शक्ति मिलती थी।

मार्था लिलार्ड का जाना न केवल एक युग का अंत है, बल्कि यह चिकित्सा जगत के उस दौर की भी विदाई है जब मानव जाति पोलियो जैसी गंभीर महामारी से जूझ रही थी। उन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं के बावजूद न केवल सात दशक से अधिक का लंबा जीवन जिया, बल्कि दुनिया भर के लाखों लोगों को यह सिखाया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद और जीने की इच्छा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। ओक्लाहोमा में उनके निधन के बाद से चिकित्सा जगत और उनके चाहने वालों के बीच शोक की लहर है। इतिहास हमेशा उन्हें एक ऐसी योद्धा के रूप में याद रखेगा जिसने लोहे के फेफड़े के भीतर रहकर भी अपनी आत्मा को कभी कैद नहीं होने दिया।

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