फ्रांस में क्यों भड़का जनआक्रोश? महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ बड़ा आंदोलन
नई दिल्ली: फ्रांस में महंगाई, स्कूलों की खराब स्थिति और पुलिस की सख्ती को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। शनिवार को राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरे और सरकार के खिलाफ नारे लगाए। प्रदर्शन में छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों, बुजुर्गों और ट्रेड यूनियनों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में करीब 4 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, जबकि ट्रेड यूनियनों ने यह संख्या लगभग 8 लाख बताई। गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में करीब 1,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। कई स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान तनाव बढ़ा और पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस तथा अन्य उपकरणों का इस्तेमाल किया।
पेरिस में एक लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे
सरकारी अनुमान के अनुसार, पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने महंगाई, शिक्षा व्यवस्था में कमियों और पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई। उनके हाथों में ऐसे पोस्टर और बैनर थे, जिन पर विरोध करने के अधिकार और सरकारी दमन के खिलाफ संदेश लिखे थे।
मार्च की शुरुआत शांतिपूर्ण रही। इसमें बड़ी संख्या में छात्र और अभिभावक भी शामिल हुए। हालांकि, मार्च के आखिरी हिस्से में कुछ नकाबपोश लोगों ने पुलिस की ओर पत्थर और कांच की बोतलें फेंकीं। कुछ जगह कूड़ेदानों में आग लगाए जाने और पटाखे फेंके जाने की खबरें भी सामने आईं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की तथा झड़पें हुईं।
मार्सेई समेत कई शहरों में तनाव
पेरिस के अलावा लियोन, लिली, मॉन्टपेलियर, नांत और टूलूज जैसे शहरों में भी प्रदर्शन हुए। पुलिस ने कई जगह भीड़ को प्रमुख इलाकों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए आंसू गैस का सहारा लिया। मार्सेई में भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की खबर आई।
रिपोर्ट के अनुसार, क्लेरमों-फेरां और टूलूज में कम से कम दो लोग गंभीर रूप से घायल हुए। टूलूज में पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए विस्फोटक उपकरण से एक व्यक्ति की उंगलियां कटने की खबर सामने आई। इन घटनाओं के बाद फ्रांस में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। संभावित हिंसा को देखते हुए 70 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। कुछ दुकानों के बाहर सुरक्षा के लिए लकड़ी के पटरे लगाए गए, जबकि कई संग्रहालय बंद रखे गए।
स्कूलों की खराब हालत से शुरू हुआ आंदोलन
इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर में हाईस्कूल के छात्रों के विरोध प्रदर्शन से हुई थी। छात्रों ने शिक्षकों की कमी, पुरानी और जर्जर इमारतों, छतों से पानी टपकने तथा कक्षाओं में पर्याप्त कुर्सियां नहीं होने जैसी समस्याएं उठाई थीं। बाद में शिक्षक, अभिभावक और ट्रेड यूनियन भी आंदोलन से जुड़ गए। उनकी मांगें स्कूलों की सुविधाओं में सुधार तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि महंगाई और पुलिस की सख्ती जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार उनकी समस्याओं पर बातचीत करने के बजाय पुलिस कार्रवाई के जरिए आंदोलन को नियंत्रित करना चाहती है। पुलिस के विस्फोटक उपकरणों से प्रदर्शनकारियों के घायल होने की घटनाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने...
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार पर विरोध जताने के अधिकार को सीमित करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि कुछ प्रदर्शनों पर रोक लगाई गई और लोगों को शहरों के प्रमुख हिस्सों तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की गई।
पेरिस में 43 वर्षीय प्रदर्शनकारी नादेज ने दावा किया कि पिछले सप्ताह शांतिपूर्ण मार्च के दौरान उन पर आंसू गैस छोड़ी गई थी। इसके बावजूद वह दोबारा प्रदर्शन में शामिल हुईं। वहीं, 21 वर्षीय एक छात्र ने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर बढ़ती चिंता जताई। हालांकि, मामले में प्रदर्शनकारियों के आरोपों और सरकार तथा पुलिस के पक्ष का अलग-अलग आकलन जरूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले शनिवार को हुए प्रदर्शनों के दौरान दुकानों में तोड़फोड़, लूटपाट, वाहनों में आगजनी और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुई थीं। उस दौरान देशभर में करीब 2,700 लोगों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी गई थी। इस बार संभावित हिंसा को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल तैनात किया गया। इस बीच वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलेनशों ने भी पेरिस के प्रदर्शन में हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि सरकार को लोगों की मांगों पर ध्यान देना चाहिए, अन्यथा असंतोष के कारण आंदोलन दोबारा होते रहेंगे।
फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शन अब शिक्षा व्यवस्था, महंगाई और पुलिस की भूमिका जैसे कई मुद्दों को लेकर चर्चा में है। आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, यह सरकार के रुख, प्रदर्शनकारियों की मांगों और दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावनाओं पर निर्भर करेगा।2.
फ्रांस में क्यों भड़का जनआक्रोश? महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ बड़ा आंदोलन
फ्रांस में महंगाई, स्कूलों की खराब स्थिति और पुलिस की सख्ती को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। शनिवार को राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरे और सरकार के खिलाफ नारे लगाए। प्रदर्शन में छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों, बुजुर्गों और ट्रेड यूनियनों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में करीब 4 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, जबकि ट्रेड यूनियनों ने यह संख्या लगभग 8 लाख बताई। गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में करीब 1,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। कई स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान तनाव बढ़ा और पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस तथा अन्य उपकरणों का इस्तेमाल किया।
पेरिस में एक लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे
सरकारी अनुमान के अनुसार, पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने महंगाई, शिक्षा व्यवस्था में कमियों और पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई। उनके हाथों में ऐसे पोस्टर और बैनर थे, जिन पर विरोध करने के अधिकार और सरकारी दमन के खिलाफ संदेश लिखे थे।
मार्च की शुरुआत शांतिपूर्ण रही। इसमें बड़ी संख्या में छात्र और अभिभावक भी शामिल हुए। हालांकि, मार्च के आखिरी हिस्से में कुछ नकाबपोश लोगों ने पुलिस की ओर पत्थर और कांच की बोतलें फेंकीं। कुछ जगह कूड़ेदानों में आग लगाए जाने और पटाखे फेंके जाने की खबरें भी सामने आईं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की तथा झड़पें हुईं।
मार्सेई समेत कई शहरों में तनाव
पेरिस के अलावा लियोन, लिली, मॉन्टपेलियर, नांत और टूलूज जैसे शहरों में भी प्रदर्शन हुए। पुलिस ने कई जगह भीड़ को प्रमुख इलाकों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए आंसू गैस का सहारा लिया। मार्सेई में भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की खबर आई।
रिपोर्ट के अनुसार, क्लेरमों-फेरां और टूलूज में कम से कम दो लोग गंभीर रूप से घायल हुए। टूलूज में पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए विस्फोटक उपकरण से एक व्यक्ति की उंगलियां कटने की खबर सामने आई। इन घटनाओं के बाद फ्रांस में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। संभावित हिंसा को देखते हुए 70 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। कुछ दुकानों के बाहर सुरक्षा के लिए लकड़ी के पटरे लगाए गए, जबकि कई संग्रहालय बंद रखे गए।
स्कूलों की खराब हालत से शुरू हुआ आंदोलन
इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर में हाईस्कूल के छात्रों के विरोध प्रदर्शन से हुई थी। छात्रों ने शिक्षकों की कमी, पुरानी और जर्जर इमारतों, छतों से पानी टपकने तथा कक्षाओं में पर्याप्त कुर्सियां नहीं होने जैसी समस्याएं उठाई थीं। बाद में शिक्षक, अभिभावक और ट्रेड यूनियन भी आंदोलन से जुड़ गए। उनकी मांगें स्कूलों की सुविधाओं में सुधार तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि महंगाई और पुलिस की सख्ती जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार उनकी समस्याओं पर बातचीत करने के बजाय पुलिस कार्रवाई के जरिए आंदोलन को नियंत्रित करना चाहती है। पुलिस के विस्फोटक उपकरणों से प्रदर्शनकारियों के घायल होने की घटनाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने...
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार पर विरोध जताने के अधिकार को सीमित करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि कुछ प्रदर्शनों पर रोक लगाई गई और लोगों को शहरों के प्रमुख हिस्सों तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की गई।
पेरिस में 43 वर्षीय प्रदर्शनकारी नादेज ने दावा किया कि पिछले सप्ताह शांतिपूर्ण मार्च के दौरान उन पर आंसू गैस छोड़ी गई थी। इसके बावजूद वह दोबारा प्रदर्शन में शामिल हुईं। वहीं, 21 वर्षीय एक छात्र ने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर बढ़ती चिंता जताई। हालांकि, मामले में प्रदर्शनकारियों के आरोपों और सरकार तथा पुलिस के पक्ष का अलग-अलग आकलन जरूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले शनिवार को हुए प्रदर्शनों के दौरान दुकानों में तोड़फोड़, लूटपाट, वाहनों में आगजनी और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुई थीं। उस दौरान देशभर में करीब 2,700 लोगों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी गई थी। इस बार संभावित हिंसा को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल तैनात किया गया। इस बीच वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलेनशों ने भी पेरिस के प्रदर्शन में हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि सरकार को लोगों की मांगों पर ध्यान देना चाहिए, अन्यथा असंतोष के कारण आंदोलन दोबारा होते रहेंगे।
फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शन अब शिक्षा व्यवस्था, महंगाई और पुलिस की भूमिका जैसे कई मुद्दों को लेकर चर्चा में है। आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, यह सरकार के रुख, प्रदर्शनकारियों की मांगों और दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावनाओं पर निर्भर करेगा।