वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को लेकर एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा दिया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से रखे गए सात दिन के युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी गई है। हालांकि सात दिन के इस प्रस्ताव से जुड़ी पूरी शर्तें सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई हैं और अमेरिकी प्रशासन ने इसके सभी विवरणों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों पर दुनिया की नजर है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच संभावित समझौते को लेकर अलग-अलग संकेत सामने आए हैं, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के सार्वजनिक बयानों से साफ है कि वॉशिंगटन ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति से पीछे नहीं हट रहा है।


ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इस संभावना पर भी चर्चा हुई है कि ईरान के साथ संघर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति के मौजूदा कार्यकाल के काफी आगे तक खिंच सकता है। यह स्थिति ट्रंप के उन सार्वजनिक बयानों से अलग तस्वीर पेश करती है जिनमें उन्होंने नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद समझौता होने की उम्मीद जताई है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में दिए अपने संबोधन में ईरान को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने कहा था कि उनके सामने यह फैसला है कि ईरान के साथ ऐसा समझौता हो जिससे देश पुनर्निर्माण कर सके या फिर अमेरिका इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ और कठोर सैन्य कार्रवाई करे। उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देने की अपनी नीति भी दोहराई।

ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि उन्हें विश्वास है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के साथ कोई समझौता हो सकता है। उनके मुताबिक ईरानी नेतृत्व यह देखने का इंतजार कर रहा है कि नवंबर के चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहता है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव 3 नवंबर 2026 को होने हैं।

हालांकि यह बात महत्वपूर्ण है कि उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टिंग ट्रंप के बारे में दो अलग-अलग दावों को सामने रखती है। एक तरफ उनके सार्वजनिक बयान चुनाव के बाद समझौते की उम्मीद बताते हैं, जबकि संघर्ष से जुड़ी रिपोर्टिंग में अमेरिकी अधिकारियों के बीच युद्ध लंबा चलने और आगे सैन्य कार्रवाई की संभावना पर चर्चा का उल्लेख है। इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि नवंबर के बाद बमबारी फिर शुरू करने का अंतिम फैसला लिया जा चुका है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप की भाषा ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा था। उन्होंने ईरान के साथ समझौता नहीं होने की स्थिति में इस्लामिक रिपब्लिक को “annihilate” करने की बात कही थी। यह उनका सार्वजनिक बयान था, जबकि आगे की अमेरिकी सैन्य रणनीति और संभावित हमलों का वास्तविक निर्णय अलग मामला है।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि उसकी प्राथमिकता ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी राष्ट्रपति के संयुक्त राष्ट्र संबोधन के विवरण में भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को अमेरिकी नीति का प्रमुख मुद्दा बताया गया है। ट्रंप ने दूसरे देशों से ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के प्रयासों में सहयोग की अपील भी की थी।

दूसरी ओर, ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष ने पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद अस्थिरता को और बढ़ाया है। समुद्री व्यापार मार्गों, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। हाल के महीनों में होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापार और तेल परिवहन भी अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है।

युद्धविराम का प्रस्ताव ठुकराए जाने की रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अस्थायी संघर्षविराम को व्यापक शांति वार्ता की दिशा में शुरुआती कदम माना जा सकता था। अगर दोनों पक्ष सीमित अवधि के लिए सैन्य गतिविधियां रोकते, तो बातचीत के लिए नया रास्ता खुल सकता था। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि अमेरिका और ईरान के बीच शर्तों को लेकर गंभीर मतभेद बरकरार हैं।

फिर भी कूटनीतिक संपर्क पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन के बाद कहा था कि उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जेरेड कुशनर ने ईरानी प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उन्होंने उस बैठक को सकारात्मक बताया। इससे संकेत मिलता है कि सार्वजनिक रूप से कड़े बयानों के बावजूद बातचीत के चैनल सक्रिय हैं।

ईरान के साथ संघर्ष का अमेरिका की घरेलू राजनीति से भी संबंध जुड़ गया है। नवंबर के मध्यावधि चुनाव में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों के लिए मतदान होगा। ट्रंप ने खुद अपने संयुक्त राष्ट्र भाषण में चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि ईरान शायद चुनाव परिणाम का इंतजार कर रहा है, जबकि उन्होंने यह भी कहा कि वह स्वयं इस चुनाव में उम्मीदवार नहीं हैं।

संघर्ष का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया के कई देशों में ऊर्जा प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। WSJ की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन ने संघर्ष से प्रभावित खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा अवसंरचना के पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर के निवेश को लेकर एक योजना भी प्रस्तावित की है।

ऐसे में सात दिन के युद्धविराम प्रस्ताव को ठुकराने की रिपोर्ट से तत्काल शांति की उम्मीदों को झटका लग सकता है। हालांकि अमेरिका या ईरान की ओर से किसी नए बड़े सैन्य अभियान की निश्चित समयसीमा घोषित नहीं की गई है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक बातचीत, अमेरिकी मध्यावधि चुनाव और दोनों देशों के सैन्य कदम यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि संघर्ष बातचीत की दिशा में बढ़ता है या एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव का रूप लेता है।

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