वॉशिंगटन। अमेरिका में ग्रीन कार्ड को लेकर एक बार फिर बड़ी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई शुरू हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के नए इमिग्रेशन नियम के खिलाफ 22 अमेरिकी राज्य और District of Columbia संघीय अदालत पहुंच गए हैं। विवाद उस नए 'पब्लिक चार्ज' नियम को लेकर है, जिसके तहत इमिग्रेशन अधिकारियों को ग्रीन कार्ड आवेदक द्वारा सरकारी सहायता के इस्तेमाल को ज्यादा व्यापक रूप से ध्यान में रखने की शक्ति मिलेगी।
नए नियम के आलोचकों का कहना है कि इससे लाखों अप्रवासी परिवारों में डर पैदा होगा और वे स्वास्थ्य सेवा, भोजन सहायता या दूसरी सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने से बचेंगे। दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इमिग्रेशन सिस्टम में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अमेरिका आने वाले लोग खुद का आर्थिक रूप से समर्थन करने में सक्षम हों और सरकारी संसाधनों पर निर्भर न रहें।
नियम **18 सितंबर 2026** से लागू होना है। इससे ठीक पहले राज्यों और स्थानीय सरकारों ने इसे रोकने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
आखिर क्या है नया 'Public Charge' नियम?
अमेरिका में 'पब्लिक चार्ज' की अवधारणा नई नहीं है।
लंबे समय से अमेरिकी इमिग्रेशन कानून के तहत ऐसे विदेशी नागरिक को स्थायी निवास देने से इनकार किया जा सकता है जिसके भविष्य में मुख्य रूप से सरकारी सहायता पर निर्भर होने की आशंका हो।
लेकिन विवाद इस बात को लेकर है कि 'सरकारी सहायता पर निर्भरता' की परिभाषा कितनी व्यापक होनी चाहिए।
ऐतिहासिक रूप से इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से नकद सरकारी सहायता या सरकार के खर्च पर दीर्घकालिक संस्थागत देखभाल जैसी स्थितियों को देखने के लिए किया जाता रहा है।
अब ट्रंप प्रशासन की नई नीति इमिग्रेशन अधिकारियों को ज्यादा व्यापक विवेकाधिकार देती है।
किन सुविधाओं को लेकर बढ़ा डर?
नई नीति को लेकर विरोध करने वाले राज्यों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब कई तरह की सार्वजनिक सहायता को ग्रीन कार्ड आवेदन के मूल्यांकन में देखा जा सकता है।
इसमें Medicaid जैसी स्वास्थ्य सहायता, SNAP यानी फूड स्टैम्प, हाउसिंग सहायता और दूसरी सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल शामिल हो सकता है।
विरोधी राज्यों का कहना है कि इससे परिवारों में यह डर पैदा होगा कि अगर उन्होंने कानूनी रूप से उपलब्ध सरकारी सहायता ली तो भविष्य में उनके ग्रीन कार्ड आवेदन पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
22 राज्यों ने किया ट्रंप प्रशासन पर मुकदमा
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स के नेतृत्व में 21 अन्य राज्यों और District of Columbia ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है।
इस गठबंधन में कैलिफोर्निया, इलिनॉय, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, हवाई, मेन, मैरीलैंड, मैसाचुसेट्स, मिशिगन, मिनेसोटा, नेवादा, न्यू जर्सी, न्यू मैक्सिको, ओरेगन, रोड आइलैंड, वरमोंट, वर्जीनिया, वॉशिंगटन और विस्कॉन्सिन समेत अन्य शामिल हैं। पेंसिल्वेनिया के गवर्नर भी चुनौती का हिस्सा हैं।
मुकदमा न्यूयॉर्क की संघीय अदालत में दाखिल किया गया है।
राज्यों ने अदालत से नए नियम को गैरकानूनी घोषित कर रद्द करने की मांग की है।
राज्यों का आरोप क्या है?
मुकदमा करने वाले राज्यों का तर्क है कि नया नियम अमेरिकी प्रशासनिक कानून का उल्लंघन करता है।
उनका दावा है कि ट्रंप प्रशासन ने 'पब्लिक चार्ज' की लंबे समय से चली आ रही कानूनी व्याख्या से हटकर इमिग्रेशन अधिकारियों को जरूरत से ज्यादा व्यापक अधिकार दे दिए हैं।
राज्यों का आरोप है कि नियम **Administrative Procedure Act** के तहत मनमाना और अनुचित है तथा Department of Homeland Security यानी DHS ने अपने वैधानिक अधिकार से आगे जाकर इसे बनाया है।
बच्चों के कारण भी फंस सकता है मामला?
नई नीति को लेकर एक और बड़ी चिंता परिवारों से जुड़ी है।
आलोचकों के मुताबिक ऐसे मामले भी प्रभावित हो सकते हैं जहां परिवार में बच्चा अमेरिकी नागरिक है और वह कानूनी रूप से किसी सरकारी सुविधा के लिए पात्र है।
उदाहरण के लिए किसी अप्रवासी माता-पिता का अमेरिका में जन्मा बच्चा कुछ सरकारी स्वास्थ्य या भोजन सहायता के लिए पात्र हो सकता है।
विरोधी पक्ष का कहना है कि नई व्यवस्था के डर से माता-पिता अपने अमेरिकी नागरिक बच्चों के लिए भी कानूनी लाभ लेने से पीछे हट सकते हैं।
यही वजह है कि कई राज्य इसे केवल इमिग्रेशन का मुद्दा नहीं बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा का मामला भी बता रहे हैं।
करीब 9.5 लाख लोगों पर पड़ सकता है असर
ट्रंप प्रशासन के Department of Homeland Security के अपने अनुमान का हवाला देते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया है कि नई नीति के कारण करीब **950,000 लोग** सरकारी सहायता कार्यक्रमों से खुद को बाहर कर सकते हैं या उनमें नामांकन कराने से बच सकते हैं।
यह जरूरी नहीं कि इन सभी लोगों का ग्रीन कार्ड आवेदन खारिज हो जाएगा।
असल चिंता 'chilling effect' की है—यानी लोग सिर्फ इस डर से कानूनी सहायता लेना बंद कर सकते हैं कि कहीं भविष्य के इमिग्रेशन आवेदन पर इसका असर न पड़े।
राज्यों को अरबों डॉलर के नुकसान की आशंका
राज्यों ने अदालत में केवल अप्रवासी परिवारों की परेशानी का मुद्दा नहीं उठाया है।
उन्होंने आर्थिक नुकसान की भी बात कही है।
DHS के अनुमानों का हवाला देते हुए कोलोराडो अटॉर्नी जनरल के कार्यालय ने कहा कि नियम के कारण लोगों के Medicaid और CHIP से बाहर होने या नामांकन नहीं कराने से राज्यों को मिलने वाले संघीय ट्रांसफर में लगभग **4.05 अरब डॉलर सालाना** की कमी हो सकती है।
SNAP से जुड़े संघीय ट्रांसफर में करीब **1.02 अरब डॉलर सालाना** की कमी का अनुमान बताया गया है।
राज्यों का तर्क है कि इससे अंततः स्थानीय अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
शहरों ने भी अलग से खोला मोर्चा
केवल राज्य ही ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत नहीं पहुंचे हैं।
न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी के नेतृत्व में कई शहरों और काउंटियों ने भी अलग मुकदमा दायर किया है।
इसमें न्यूयॉर्क सिटी के साथ शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल, कैलिफोर्निया का सांता क्लारा काउंटी और वॉशिंगटन का किंग काउंटी शामिल हैं।
इन स्थानीय सरकारों का कहना है कि अगर अप्रवासी परिवार स्वास्थ्य, भोजन और आवास सहायता से पीछे हटते हैं तो इसका सीधा असर शहरों की सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ेगा।
ट्रंप प्रशासन ने क्या कहा?
ट्रंप प्रशासन इस पूरे मामले को अलग नजरिए से देख रहा है।
Department of Homeland Security का तर्क है कि 'पब्लिक चार्ज' नियम का उद्देश्य अमेरिकी करदाताओं और सरकारी संसाधनों की सुरक्षा करना है।
प्रशासन का कहना है कि अमेरिका की इमिग्रेशन व्यवस्था में आत्मनिर्भरता के सिद्धांत को मजबूत किया जाना चाहिए।
DHS ने मुकदमा करने वाले राज्यों की आलोचना करते हुए कहा कि नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गैर-नागरिक सरकारी कल्याण कार्यक्रमों पर निर्भर न हों।
यानी कानूनी लड़ाई के केंद्र में मूल सवाल यह है कि अमेरिकी सरकार किसी ग्रीन कार्ड आवेदक की आर्थिक आत्मनिर्भरता को किस सीमा तक और किन आधारों पर जांच सकती है।
क्या सरकारी सहायता लेने पर ग्रीन कार्ड सीधे खारिज होगा?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।
नई नीति का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति ने कभी Medicaid या दूसरी सरकारी सुविधा का इस्तेमाल किया और उसका ग्रीन कार्ड अपने आप रद्द या खारिज हो जाएगा।
नई व्यवस्था इमिग्रेशन अधिकारियों को आवेदन का मूल्यांकन करते समय ज्यादा व्यापक परिस्थितियों पर विचार करने का अधिकार देती है।
इसी 'discretion' यानी विवेकाधिकार को लेकर विरोधी पक्ष सबसे ज्यादा चिंतित है।
उनका कहना है कि नियम पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं है और इससे अलग-अलग अधिकारियों द्वारा अलग-अलग तरीके से फैसला किए जाने का खतरा पैदा हो सकता है।
पहले भी ट्रंप ला चुके हैं ऐसा नियम
इस विवाद की जड़ ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल तक जाती है।
2019 में ट्रंप प्रशासन ने 'पब्लिक चार्ज' नियम को व्यापक बनाने की कोशिश की थी।
उस समय भी कई राज्यों और अप्रवासी अधिकार संगठनों ने इसे अदालत में चुनौती दी थी।
मामला लंबी कानूनी लड़ाई में फंस गया था।
बाद में जो बाइडेन प्रशासन ने ट्रंप के पहले कार्यकाल वाली नीति को वापस ले लिया और पब्लिक चार्ज की अपेक्षाकृत संकरी व्याख्या वाली व्यवस्था लागू की।
अब ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा फिर लौट आया है।
2019 और 2026 की लड़ाई में समानता
मौजूदा कानूनी विवाद में दिलचस्प बात यह है कि कई वही राज्य एक बार फिर अदालत पहुंचे हैं जिन्होंने ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी पब्लिक चार्ज नियम को चुनौती दी थी।
कैलिफोर्निया समेत विरोधी पक्ष का कहना है कि पहले भी अदालतों में ऐसी व्यापक नीति को चुनौती मिली थी और इस बार भी प्रशासन कानून की स्थापित व्याख्या से आगे जा रहा है।
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि नया नियम अमेरिकी इमिग्रेशन कानून में लंबे समय से मौजूद आत्मनिर्भरता के सिद्धांत को लागू करता है।
अब संघीय अदालत को इन दोनों तर्कों की वैधानिकता पर फैसला करना होगा।
भारतीयों पर भी पड़ सकता है असर?
यह सवाल भारतीय पाठकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रोजगार, परिवार और दूसरी श्रेणियों के जरिए ग्रीन कार्ड की लंबी प्रक्रिया में हैं।
हालांकि नई नीति का असर हर भारतीय ग्रीन कार्ड आवेदक पर समान रूप से नहीं पड़ेगा।
अमेरिका में कई गैर-नागरिक पहले से ही अनेक सार्वजनिक लाभों के लिए पात्र नहीं होते। इसलिए यह कहना गलत होगा कि हर H-1B धारक या हर भारतीय ग्रीन कार्ड आवेदक इस नियम से सीधे प्रभावित होगा।
लेकिन जिन मामलों में आवेदक या उसके परिवार द्वारा पात्र सार्वजनिक सहायता का इस्तेमाल किया गया है, वहां नए नियम की व्याख्या महत्वपूर्ण हो सकती है।
व्यक्तिगत इमिग्रेशन मामले में अमेरिकी इमिग्रेशन वकील से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित होगा।
ग्रीन कार्ड क्या होता है?
ग्रीन कार्ड अमेरिका में **Lawful Permanent Resident** यानी वैध स्थायी निवासी का दर्जा देता है।
ग्रीन कार्ड धारक अमेरिका में स्थायी रूप से रह और काम कर सकता है, हालांकि उसके अधिकार अमेरिकी नागरिक के समान पूरी तरह नहीं होते।
रोजगार आधारित और परिवार आधारित श्रेणियों समेत कई रास्तों से ग्रीन कार्ड प्राप्त किया जा सकता है।
भारतीय पेशेवरों के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि कई श्रेणियों में लंबा बैकलॉग है।
ऐसे में इमिग्रेशन नियमों में कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय समुदाय में भी चिंता पैदा करता है।
18 सितंबर से लागू होना है नियम
मौजूदा कानूनी लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नियम के लागू होने की तारीख बेहद करीब है।
नई पब्लिक चार्ज नीति **18 सितंबर 2026** से प्रभावी होने वाली है।
राज्यों और शहरों ने इससे पहले अदालत से हस्तक्षेप की मांग की है।
अगर अदालत नियम पर रोक लगाती है तो इसका लागू होना टल सकता है।
अगर तत्काल राहत नहीं मिलती तो नीति निर्धारित तारीख से प्रभावी हो सकती है और मुकदमा आगे चलता रहेगा।
इसलिए आने वाले दिन अमेरिकी इमिग्रेशन नीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
अब अदालत तय करेगी आगे का रास्ता
अमेरिका में ग्रीन कार्ड पर छिड़ी यह लड़ाई केवल इमिग्रेशन पॉलिसी का विवाद नहीं रह गई है।
एक तरफ ट्रंप प्रशासन है, जो कह रहा है कि अमेरिका आने वाले अप्रवासियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना जरूरी है।
दूसरी तरफ 22 राज्य, District of Columbia और कई बड़े शहर हैं, जिनका कहना है कि सरकार ने पब्लिक चार्ज की परिभाषा जरूरत से ज्यादा व्यापक कर दी है और इससे वैध अप्रवासी परिवार भी जरूरी स्वास्थ्य, भोजन और आवास सहायता लेने से डरेंगे।
न्यूयॉर्क अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अदालत से 2026 के पब्लिक चार्ज नियम को गैरकानूनी घोषित कर खत्म करने की मांग की है।
अब सबसे बड़ी नजर संघीय अदालत पर है।
अदालत अगर राज्यों की मांग स्वीकार करती है तो ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीति को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं अगर नियम लागू रहता है तो ग्रीन कार्ड आवेदन की प्रक्रिया में सरकारी लाभों के इस्तेमाल का महत्व बढ़ सकता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि **18 सितंबर से पहले ही ट्रंप के नए ग्रीन कार्ड नियम पर अमेरिका में बड़ी कानूनी जंग शुरू हो चुकी है और इसका अंतिम परिणाम लाखों अप्रवासी परिवारों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।