क्वेटा। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कथित जबरन गुमशुदगी के नए मामलों ने एक बार फिर मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ‘द बलूचिस्तान पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक खारन, केच और मस्तुंग से तीन लोगों के कथित तौर पर लापता होने की खबर सामने आई है, जबकि क्वेटा का एक व्यक्ति घर लौट आया है। इन मामलों में परिवारों और स्थानीय सूत्रों ने अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों तथा सशस्त्र समूहों पर आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित पाकिस्तानी अधिकारियों की ओर से इन विशिष्ट मामलों पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, खारन के रहने वाले 37 वर्षीय डॉ. अब्दुल मलिक, जो हाजी नूर अहमद के बेटे बताए गए हैं, को कथित तौर पर 2 अक्टूबर की रात करीब 2 बजे फ्रंटियर कॉर्प्स यानी FC के कर्मियों ने हिरासत में लिया था। परिवार का दावा है कि इसके बाद से उनका कोई पता नहीं है और न ही उन्हें यह जानकारी दी गई है कि उन्हें कहां रखा गया है। परिवार लगातार उनकी सुरक्षित वापसी और ठिकाने की जानकारी की मांग कर रहा है।
केच जिले में दूसरा मामला 27 वर्षीय असद बलोच से जुड़ा है। वह शापुक के रहने वाले बताए गए हैं और कौडा दिल मुराद के बेटे हैं। रिपोर्ट में स्थानीय सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि असद को 18 अगस्त की रात अबसार, तुरबत स्थित उनके घर से कथित तौर पर उठा लिया गया था। सूत्रों ने इसके लिए एक हथियारबंद समूह को जिम्मेदार ठहराया है, जिसे उन्होंने कथित रूप से सरकार समर्थित “डेथ स्क्वाड” बताया। यह आरोप गंभीर है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
तीसरा मामला मस्तुंग के 18 वर्षीय मुमताज बलोच का है। रिपोर्ट के मुताबिक मुमताज, सुल्तान मुहम्मद के बेटे हैं और उन्हें कथित तौर पर 5 जून को फ्रंटियर कॉर्प्स और मिलिट्री इंटेलिजेंस के कर्मियों ने हिरासत में लिया था। परिवार का दावा है कि उस दिन के बाद से उनका ठिकाना अज्ञात है। इस मामले में भी कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आया है।
इसी बीच क्वेटा से राहत की खबर भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, सरीआब इलाके के रहने वाले मलिक अली नवाज बलोच, जो गुलाम जान के बेटे हैं, कथित तौर पर 2 अक्टूबर को लापता हुए थे और 3 अक्टूबर को घर लौट आए। उनके लौटने की परिस्थितियों और इस दौरान वह कहां थे, इस बारे में फिलहाल विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
बलूचिस्तान में इस तरह की कथित जबरन गुमशुदगी कोई नया मुद्दा नहीं है। पिछले कई वर्षों से स्थानीय परिवार, मानवाधिकार संगठन और राजनीतिक समूह आरोप लगाते रहे हैं कि सुरक्षा अभियानों के दौरान लोगों को हिरासत में लेने के बाद लंबे समय तक उनके ठिकाने की जानकारी नहीं दी जाती। दूसरी ओर पाकिस्तानी अधिकारी कई मौकों पर ऐसे व्यापक आरोपों से इनकार करते रहे हैं और सुरक्षा अभियानों को आतंकवाद तथा उग्रवाद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई बताते हैं।
हाल के महीनों में भी बलूचिस्तान के अलग-अलग जिलों से इस तरह के कई मामले सामने आए हैं। सितंबर में क्वेटा और मस्तुंग से कथित गुमशुदगी की रिपोर्टों में परिवारों ने काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों पर आरोप लगाए थे। कुछ मामलों में महीनों बाद संबंधित लोग घर लौटे, जबकि कई परिवार अभी भी अपने रिश्तेदारों की जानकारी का इंतजार कर रहे हैं।
सितंबर के दौरान केच, ग्वादर और क्वेटा से कथित रूप से लापता हुए कुछ लोगों के बाद में घर लौटने की खबरें भी सामने आई थीं। इससे यह स्थिति और जटिल हो जाती है, क्योंकि कई मामलों में यह साफ नहीं हो पाता कि संबंधित व्यक्ति कहां और किसकी हिरासत में थे। परिवार और मानवाधिकार समूह पारदर्शी जांच और हिरासत में लिए गए लोगों को अदालतों के सामने पेश किए जाने की मांग करते रहे हैं।
स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई परिवार भय, सुरक्षा चिंताओं या सामाजिक दबाव की वजह से कथित गुमशुदगी की घटनाओं को तुरंत सार्वजनिक नहीं करते। इस कारण कुछ मामले हफ्तों या महीनों बाद सामने आते हैं। ‘द बलूचिस्तान पोस्ट’ की रिपोर्ट में भी इस पहलू का जिक्र किया गया है और कहा गया है कि वास्तविक मामलों की संख्या सार्वजनिक रिकॉर्ड से अधिक हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी अतीत में बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी के मामलों पर चिंता जताई है। ऐसे मामलों में मुख्य मांग यह रहती है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के बारे में परिवार को जानकारी दी जाए, उसे कानून के तहत अदालत में पेश किया जाए और यदि उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं है तो उसे रिहा किया जाए।
बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा चुनौतियों, अलगाववादी हिंसा और सैन्य अभियानों से प्रभावित रहा है। इसी पृष्ठभूमि में जब भी कोई व्यक्ति कथित रूप से हिरासत के बाद लापता होता है, तो सुरक्षा एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो जाते हैं। कई परिवार वर्षों से अपने लापता परिजनों की जानकारी के लिए प्रदर्शन और अभियान भी चलाते रहे हैं।
खारन, केच और मस्तुंग के ताजा मामलों ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है। परिवारों की मांग है कि लापता लोगों की स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि वे किसी एजेंसी की हिरासत में हैं तो उन्हें कानून के तहत पेश किया जाए। वहीं क्वेटा के मलिक अली नवाज बलोच की वापसी ने कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन बाकी तीन लोगों के बारे में जानकारी नहीं मिलने से परिजनों की चिंता बरकरार है।
फिलहाल इन मामलों में स्वतंत्र और आधिकारिक जांच की आवश्यकता बनी हुई है। जब तक संबंधित सुरक्षा एजेंसियां या पाकिस्तानी प्रशासन विस्तृत जवाब नहीं देते, तब तक लगाए गए आरोपों को दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी का मुद्दा आने वाले दिनों में भी मानवाधिकार और राजनीतिक बहस के केंद्र में बना रह सकता है।