ब्रिटेन : गले में फंदा डाला गया, जल्लाद ने लीवर खींचा, लेकिन कैदी के पैरों के नीचे लगा दरवाजा नहीं खुला। उसे हटाकर व्यवस्था की जांच हुई तो मशीन ठीक काम करने लगी। कैदी को दोबारा खड़ा किया गया और फिर वही गड़बड़ी सामने आई। इंग्लैंड के जॉन ‘बैबाकोम्ब’ ली की यह घटना इतिहास की असाधारण कहानियों में शामिल है। प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उसे फांसी देने की तीन कोशिशें नाकाम रहीं। हालांकि, उसे बचाने के लिए ‘शैतान धरती पर आया था’, इसका कोई प्रमाण नहीं है। दर्ज विवरण फांसी के उपकरण की खराबी की ओर इशारा करते हैं।

यह मामला 19वीं सदी के इंग्लैंड का है। जॉन ली अपनी नियोक्ता एम्मा कीज़ की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। एम्मा की हत्या 15 नवंबर 1884 को बैबाकोम्ब में उनके घर पर हुई थी। ली उसी घर में कर्मचारी था। मुकदमे के बाद उसे मौत की सजा सुनाई गई और फांसी के लिए 23 फरवरी 1885 की तारीख तय हुई। उस समय किसी को यह अंदाजा नहीं था कि सजा लागू करने की प्रक्रिया नाकाम होगी और ली अपने मुकदमे से भी अधिक फांसी से बचने की घटना के लिए चर्चित हो जाएगा। 
ली को इंग्लैंड की एक्सेटर जेल में फांसी दी जानी थी। इसकी जिम्मेदारी जल्लाद जेम्स बेरी के पास थी। बेरी ने बाद में अपने संस्मरण में इस घटना का विवरण लिखा। उनके अनुसार, फांसी से पहले उन्होंने उपकरण की जांच की थी। लीवर चलाने पर नीचे लगे दरवाजे खुल रहे थे। हालांकि, उन्होंने व्यवस्था को कमजोर भी बताया था। निर्धारित सुबह ली को लाया गया और उसके गले में फंदा लगाया गया। फिर बेरी ने लीवर खींचा, लेकिन जिस दरवाजे को खुलना था, वह अपनी जगह अटका रहा। 
बेरी के विवरण में कहा गया है कि बोल्ट खिसकने की आवाज सुनाई दी, फिर भी दरवाजे नहीं खुले। उन्हें हिलाकर खोलने की कोशिश भी काम नहीं आई। इसके बाद ली को वहां से हटाया गया। हैरानी की बात यह थी कि उसके हटते ही जांच में दरवाजे आसानी से खुल गए। उसे फिर उसी जगह खड़ा करने पर उपकरण दोबारा काम नहीं कर पाया। घटना का यही हिस्सा बाद में रहस्य और चमत्कार की कहानियों का आधार बना। लोगों के लिए यह समझना कठिन था कि खाली उपकरण चलता क्यों था और कैदी के खड़े होने पर अटक क्यों जाता था। 
ऐतिहासिक विवरणों में कोशिशों की संख्या को लेकर एक अंतर भी मिलता है। स्थानीय इतिहास और अधिकांश प्रचलित वृत्तांत तीन नाकाम प्रयासों का उल्लेख करते हैं, जबकि बेरी के संस्मरण में कैदी को खड़ा करके दो प्रयास करने का स्पष्ट वर्णन है। इसलिए इस घटना की लोकप्रिय कहानी और प्रत्यक्ष सहभागी के लिखित विवरण को साथ पढ़ना जरूरी है। दोनों में मुख्य बात समान है—फांसी का नीचे खुलने वाला दरवाजा काम नहीं कर पाया और ली की जान बच गई। यह मामला वास्तविक घटना था, लेकिन उसके सभी विवरण हर स्रोत में एक जैसे नहीं हैं। 
नाकाम कोशिशों के बाद फांसी की प्रक्रिया रोक दी गई। तत्कालीन गृह सचिव सर विलियम हारकोर्ट ने ली की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। इसका अर्थ यह नहीं था कि उसे हत्या के मामले में निर्दोष घोषित कर दिया गया था। वह जेल में रहा और अपनी बेगुनाही का दावा करते हुए अधिकारियों को गुहार भेजता रहा। लगभग 22 साल की कैद के बाद उसे 1907 में रिहा किया गया। फांसी से बचना और आपराधिक मामले में दोषमुक्त होना दो अलग बातें हैं, जिन्हें इस कहानी में अक्सर मिला दिया जाता है।
उपकरण क्यों अटका, इसकी तकनीकी व्याख्याएं भी सामने आईं। स्थानीय इतिहास के विवरण में दरवाजों के पतले होने और आदमी का वजन पड़ने पर उनके झुककर तंत्र को जाम कर देने का उल्लेख है। दूसरे ऐतिहासिक विवरण में फांसी की व्यवस्था दूसरी जगह लगाने के बाद हिस्सों के सही संरेखण में गड़बड़ी बताई गई है। व्याख्याओं में अंतर होने के बावजूद दोनों उपकरण की खराबी की बात करते हैं। बेरी ने बारिश से लकड़ी फूलने की धारणा पर भी सवाल उठाया था, क्योंकि दरवाजे कैदी का वजन हटने पर खुल रहे थे। torbay.gov.uk
घटना के बाद तरह-तरह की अफवाहें फैलीं। कुछ लोगों ने इसे ईश्वर का हस्तक्षेप माना, तो कुछ ने जादू-टोने की कहानी जोड़ दी। जल्लाद को रिश्वत देकर फांसी बिगाड़ने की अफवाह भी सामने आई। इन बातों को पुष्ट तथ्य नहीं माना जा सकता। खासकर ‘शैतान खुद बचाने आया’ वाला दावा उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों से समर्थित नहीं है। असाधारण घटना ने लोगों की कल्पना को जरूर प्रभावित किया, लेकिन उसकी तकनीकी व्याख्या मौजूद है। ली को प्रसिद्धि दिलाने वाला नाम भी इसी घटना से जुड़ा—ऐसा आदमी, जिसे वे फांसी नहीं दे सके। torbay.gov.uk
रिहाई के बाद ली ने अपनी कहानी लोगों तक पहुंचाई। उसके जीवन और नाकाम फांसी पर व्याख्यान तथा फिल्म भी बने। वर्षों बाद भी इस मामले में दिलचस्पी बनी रही। इसकी वजह किसी अलौकिक शक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि मौत की सजा लागू करते समय बार-बार विफल हुआ उपकरण और उसके बाद बदला गया दंड था। जॉन ली की कहानी पढ़ते समय यही अंतर याद रखना जरूरी है: फांसी की कोशिशें नाकाम हुई थीं, लेकिन उसे ‘शैतान ने बचाया’ कहना इतिहास के दर्ज तथ्यों से आगे की कल्पना है।
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