दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान को लेकर देश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भागवत की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए तंज कसा और सवाल किया कि क्या यह राहुल गांधी का भाषण था। इसके साथ ही उन्होंने देश की विविधता और अलग-अलग समुदायों को स्वीकार करने के मुद्दे पर RSS को घेरा।
कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई जब मोहन भागवत ने विविधता, हिंदू समाज और भारत में मुसलमानों की मौजूदगी को लेकर अपनी बात रखी। भागवत के बयान के बाद सिब्बल ने कहा कि अगर देश की विविधता को स्वीकार करने की बात की जा रही है तो फिर व्यवहार में भी वही सोच दिखाई देनी चाहिए।
भागवत के बयान पर सिब्बल का तंज
कपिल सिब्बल ने मोहन भागवत के बयान का जिक्र करते हुए सवाल किया कि आखिर यह RSS प्रमुख का भाषण था या राहुल गांधी का। उनका इशारा इस ओर था कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी अपनी राजनीतिक सभाओं में लगातार विविधता, सामाजिक सद्भाव और सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात करते रहे हैं।
सिब्बल ने सवाल उठाया कि अगर अब RSS भी विविधता को भारत की ताकत मान रहा है तो देश की राजनीति और सामाजिक जीवन में इसे पूरी तरह स्वीकार करने में परेशानी क्यों होनी चाहिए।
उनका कहना था कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। यहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं को मानने वाले लोग सदियों से साथ रहते आए हैं।
मोहन भागवत ने क्या कहा?
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में हिंदू समाज और विविधता को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान विविधता में एकता की रही है और अलग-अलग समुदाय इस देश का हिस्सा हैं।
भागवत ने इस विचार पर भी जोर दिया कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं रहने चाहिए तो ऐसी सोच हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा के अनुरूप नहीं है। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
एक तरफ इसे सामाजिक सद्भाव और समावेशिता के संदेश के तौर पर देखा गया, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी नेताओं ने RSS और भाजपा की राजनीति को लेकर पुराने सवाल दोहराए।
सिब्बल ने पूछा- फिर विविधता स्वीकार क्यों नहीं?
कपिल सिब्बल ने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधता है। उन्होंने सवाल किया कि अगर इस सिद्धांत को स्वीकार किया जा रहा है तो इसे राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी समान रूप से लागू क्यों नहीं किया जाता?
उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है। किसी नागरिक के साथ उसके धर्म, जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
सिब्बल के मुताबिक, केवल भाषण में विविधता का समर्थन करना पर्याप्त नहीं है। सरकार और सामाजिक संगठनों के कामकाज में भी यह दिखाई देना चाहिए कि सभी नागरिक बराबर हैं।
राहुल गांधी का क्यों किया जिक्र?
राहुल गांधी लंबे समय से अपनी राजनीतिक रणनीति में संविधान, सामाजिक न्याय और विविधता के मुद्दों को प्रमुखता देते रहे हैं। वह कई मौकों पर यह कहते रहे हैं कि भारत अलग-अलग विचारों, संस्कृतियों और समुदायों का देश है।
इसी वजह से सिब्बल ने भागवत के बयान की तुलना राहुल गांधी के भाषण से करते हुए राजनीतिक तंज कसा। उनका सवाल मूल रूप से RSS की मौजूदा टिप्पणियों और उसकी राजनीतिक-सामाजिक छवि के बीच कथित अंतर को लेकर था।
भाजपा और विपक्ष में पुरानी बहस
RSS और हिंदुत्व को लेकर भाजपा तथा विपक्षी दलों के बीच लंबे समय से वैचारिक बहस चलती रही है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल भाजपा और RSS पर बहुसंख्यकवादी राजनीति करने का आरोप लगाते हैं।
दूसरी ओर भाजपा और RSS इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते रहे हैं कि उनकी विचारधारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सभी भारतीयों को एक सूत्र में जोड़ने पर आधारित है।
मोहन भागवत भी अलग-अलग अवसरों पर सामाजिक समरसता और विभिन्न समुदायों के बीच संवाद बढ़ाने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।
मुसलमानों को लेकर बयान की चर्चा
भागवत की मुसलमानों से जुड़ी टिप्पणी इस पूरे भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा बनी। उनका संदेश था कि भारत में रहने वाले विभिन्न समुदाय देश की सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं और किसी समुदाय को बाहर रखने की सोच उचित नहीं है।
इसी बयान को लेकर विपक्ष ने सवाल किया कि अगर RSS का यही दृष्टिकोण है तो जमीनी राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण से जुड़े विवाद बार-बार क्यों सामने आते हैं।
हालांकि RSS की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा है कि हिंदुत्व किसी समुदाय के खिलाफ नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी व्यापक अवधारणा है।
संविधान और समानता पर सिब्बल का जोर
कपिल सिब्बल ने अपनी प्रतिक्रिया में संविधान की भावना को महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि विविधता केवल सामाजिक वास्तविकता नहीं बल्कि भारत की ताकत भी है। इसे कमजोर करने की बजाय मजबूत किया जाना चाहिए।
राजनीतिक मायने भी अहम
मोहन भागवत की टिप्पणी और उस पर कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। देश की राजनीति में धर्म, संविधान और सामाजिक न्याय लगातार महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं।
ऐसे में RSS प्रमुख की ओर से विविधता और मुसलमानों को लेकर दिया गया संदेश स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष इसे RSS से सवाल पूछने के अवसर के तौर पर देख रहा है, जबकि संघ इसे अपनी व्यापक सामाजिक सोच के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।
फिलहाल कपिल सिब्बल के सवाल ने बहस को नई दिशा दे दी है। उनका तंज कि यह "राहुल गांधी का भाषण था या..." राजनीतिक संदेश के साथ-साथ उस वैचारिक बहस को भी सामने लाता है जिसमें सवाल यह है कि भारत की विविधता को केवल शब्दों में नहीं बल्कि व्यवहार और नीतियों में किस तरह जगह दी जाती है।