न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्च स्तरीय सत्र के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था बड़े संघर्षों को सुलझाने में प्रभावी साबित नहीं हो रही है और इसे अपने मूल उद्देश्य तथा भूमिका पर वापस लौटने की जरूरत है। रुबियो ने अपनी बात समझाने के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित संघर्ष के साथ थाईलैंड-कंबोडिया, सूडान और रवांडा जैसे उदाहरणों का भी उल्लेख किया।

न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रुबियो ने कहा कि कई वैश्विक नेताओं ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार व्यवस्था अपने निर्धारित दायरे और मूल उद्देश्य से आगे बढ़ गई है, जबकि दुनिया के प्रमुख संघर्षों को हल करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही। रुबियो ने कहा कि इस बात पर व्यापक सहमति दिखाई देती है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय तंत्र ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा है।

रुबियो ने संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की उपयोगिता को स्वीकार करता है और इसी कारण संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर मौजूद है। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस टिप्पणी का भी जिक्र किया जिसमें संयुक्त राष्ट्र में बड़ी संभावनाएं होने की बात कही गई थी, लेकिन साथ ही कहा गया था कि संगठन फिलहाल अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर रहा।

भारत और पाकिस्तान का जिक्र करते हुए रुबियो ने कहा कि एक प्रभावी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो संभावित संघर्षों से निपट सके। उन्होंने थाईलैंड और कंबोडिया के बीच युद्ध, भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित संघर्ष तथा अफ्रीका और मध्य पूर्व के संकटों का उदाहरण देते हुए कहा कि फिलहाल ऐसा प्रभावी वैश्विक तंत्र दिखाई नहीं देता जो इन समस्याओं को सफलतापूर्वक संबोधित कर सके।

अमेरिकी विदेश मंत्री का बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक दिन पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले साल हुए तनाव को समाप्त कराने में अपनी भूमिका का दावा किया था। भारत ने ऐसे दावों पर लगातार अपना अलग पक्ष रखा है। नई दिल्ली के मुताबिक मई 2025 में सैन्य कार्रवाई रोकने को लेकर सहमति भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस यानी DGMO के बीच सीधे संपर्क के बाद बनी थी और इसमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं थी।

ऐसे में रुबियो की टिप्पणी को ट्रंप के दावे का सीधा खंडन कहना सावधानी की मांग करता है। रुबियो मुख्य रूप से मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थागत व्यवस्था की क्षमता पर सवाल उठा रहे थे और उनका कहना था कि दुनिया में बड़े संकटों को संभालने वाला पर्याप्त रूप से प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। उन्होंने भारत-पाकिस्तान को इसी व्यापक संदर्भ में एक संभावित संघर्ष के उदाहरण के तौर पर रखा।

रुबियो ने अमेरिका की विदेश नीति की प्राथमिकता भी स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा। उनके मुताबिक अमेरिका अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के महत्व को स्वीकार करता है, लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अमेरिकी राष्ट्रीय हित से ऊपर नहीं रखेगा। यह बयान ट्रंप प्रशासन की उस विदेश नीति के अनुरूप है जिसमें बहुपक्षीय संस्थाओं के साथ काम करने के बावजूद अमेरिकी हितों को प्राथमिक आधार बताया जाता रहा है।

रुबियो की टिप्पणी ने संयुक्त राष्ट्र और दूसरी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार को लेकर लंबे समय से जारी बहस को भी फिर से सामने ला दिया है। भारत भी वर्षों से संयुक्त राष्ट्र, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता आया है। भारत का तर्क रहा है कि वैश्विक संस्थाओं की संरचना में आज की भू-राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं का बेहतर प्रतिनिधित्व होना चाहिए। मौजूदा UNGA सत्र के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी बहुपक्षवाद को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है।

रुबियो के मुताबिक समस्या केवल किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अपने मूल दायरे से आगे निकल गई है और इसी वजह से वह कई प्रमुख संकटों को सुलझाने में प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रही। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर हमले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार जरूरत इस व्यवस्था को उसके उचित फोकस और भूमिका की ओर वापस लाने की है।

दुनिया इस समय कई मोर्चों पर संघर्ष और तनाव का सामना कर रही है। ऐसे समय में अमेरिका के शीर्ष राजनयिक की ओर से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर की गई यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खासकर भारत-पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुद्दे का उल्लेख होने से दक्षिण एशिया में भी इस बयान की चर्चा तेज हो गई है।

रुबियो के बयान से एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि संयुक्त राष्ट्र और मौजूदा बहुपक्षीय संस्थाएं आज के जटिल संघर्षों को रोकने और सुलझाने में कितनी प्रभावी हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री ने जहां मौजूदा व्यवस्था की कमियों को रेखांकित किया, वहीं इसकी उपयोगिता को भी स्वीकार किया। उनके बयान का मुख्य संदेश यह रहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने और उनके मूल उद्देश्यों पर दोबारा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

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