नईदिल्ली : पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के पुंछ डिवीजन में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने 24 अक्टूबर से फिर बड़े आंदोलन की तैयारी की है। कोटली में मुख्य जनसभा आयोजित करने की योजना है, जबकि रावलाकोट, अब्बासपुर, मुजफ्फराबाद और मीरपुर में भी प्रदर्शन की तैयारी चल रही है। इंटरनेट पाबंदियों, महंगाई, नागरिक सुविधाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर क्षेत्र में तनाव बना हुआ है। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि उनकी मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन फिर तेज किया जा सकता है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले ...
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के पुंछ डिवीजन में एक बार फिर बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने 24 अक्टूबर से आंदोलन तेज करने की योजना बनाई है। क्षेत्र में पहले से ही इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी, बाजारों की आंशिक बंदी और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर असंतोष बना हुआ है।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस बार कोटली को आंदोलन का मुख्य केंद्र बनाया गया है। यहां एक बड़ी जनसभा आयोजित करने की तैयारी है। रावलाकोट और अब्बासपुर में चल रहे धरनों के भी इसी दिन कोटली की मुख्य सभा में शामिल होने की योजना है। वहीं, मुजफ्फराबाद और मीरपुर में चक्का जाम की तैयारी की जा रही है।
इंटरनेट सेवाएं बहाल, लेकिन कई इलाकों में पाबंदी जारी
क्षेत्र में संचार सेवाओं की स्थिति अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। मुजफ्फराबाद में लगभग 136 दिनों के बाद इंटरनेट सेवा दोबारा शुरू कर दी गई है, लेकिन पुंछ और कोटली के कुछ हिस्सों में मोबाइल और इंटरनेट पर प्रतिबंध अभी भी लागू हैं।
इन पाबंदियों से छात्रों, कारोबारियों और आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इंटरनेट के जरिए पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों और ऑनलाइन कामकाज पर निर्भर कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ी हैं। आंदोलनकारी नागरिक सुविधाओं को सामान्य करने और सुरक्षा प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहे हैं।
जेएएसी का आंदोलन शुरुआत में महंगे बिजली बिल, गेहूं के आटे की बढ़ती कीमतों और आर्थिक राहत की मांग को लेकर शुरू हुआ था। धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता गया और इसमें प्रशासन की जवाबदेही, नागरिक अधिकार, सार्वजनिक सेवाओं में सुधार तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए। आंदोलन की प्रमुख मांगों में पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करना भी शामिल है। जेएएसी का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण क्षेत्र के स्थानीय मतदाताओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ता है। इसी मुद्दे को लेकर संगठन और प्रशासन के बीच विवाद बना हुआ है।
पिछले आंदोलन के दौरान हिंसा और अपहरण के गंभीर आरोप
खबर में दिए गए दावों के मुताबिक, जुलाई से सितंबर के बीच हुए बड़े आंदोलन के दौरान पाकिस्तानी सेना पर 150 प्रदर्शनकारियों की हत्या करने के आरोप लगाए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों के हवाले से यह भी दावा किया गया है कि करीब 200 महिलाओं और युवतियों का अपहरण किया गया, जिनके बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है।
इस दौरान आंदोलनकारियों को आतंकवादी घोषित करने और प्रभावित क्षेत्रों में रेंजरों की तैनाती के दावे भी सामने आए हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इन गंभीर आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इन्हें फिलहाल आरोपों और दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
समझौता नहीं हुआ तो आंदोलन तेज होने की चेतावनी
24 अक्टूबर को प्रस्तावित लामबंदी से पहले राजनीतिक समाधान निकालने की मांग भी उठाई गई है। सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर डॉ. विजय सागर धीमान ने चेतावनी दी है कि यदि स्थानीय सरकार और पाकिस्तान के सुरक्षा अधिकारियों ने जेएएसी नेतृत्व के साथ कोई ठोस और सम्मानजनक राजनीतिक समझौता नहीं किया, तो हालात बिगड़ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जेएएसी पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि मांगों पर दोबारा धोखा मिलने की स्थिति में बड़ा आंदोलन शुरू किया जा सकता है। फिलहाल क्षेत्र में सभी की नजर 24 अक्टूबर की प्रस्तावित जनसभा और आंदोलन की रणनीति पर है। इंटरनेट प्रतिबंध, आर्थिक राहत, नागरिक सुविधाओं और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर समाधान निकलता है या नहीं, इससे आगे की स्थिति तय हो सकती है।
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