फ्रांस में सियासी हलचल तेज, मेलनचोन ने प्रदर्शनकारियों के साथ उठाई आवाज
पेरिस। फ्रांस में राजनीतिक और सामाजिक असंतोष के बीच राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलनचोन एक बार फिर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सड़कों पर नजर आए। पेरिस में आयोजित विरोध प्रदर्शन में उनकी भागीदारी ने फ्रांस की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। देश में महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार की मांग को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों में छात्रों, श्रमिक संगठनों और आम नागरिकों की भागीदारी बढ़ रही है।मेलनचोन की मौजूदगी को आगामी राष्ट्रपति चुनाव से पहले वामपंथी राजनीति की सक्रियता के तौर पर भी देखा जा रहा है। वह सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए प्रदर्शनकारियों की मांगों को राजनीतिक समर्थन देते रहे हैं। फ्रांस में अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और मौजूदा राजनीतिक माहौल में विरोध प्रदर्शनों का चुनावी प्रभाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
महंगाई और शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ रहा असंतोष
फ्रांस में पिछले कुछ समय से सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई ने आम लोगों का घरेलू बजट बिगाड़ दिया है। ईंधन की कीमतें, आवास का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुएं आम नागरिकों के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं।24 अक्टूबर को पेरिस में हुए प्रदर्शन में मेलनचोन अपनी पार्टी ला फ्रांस इंसौमिस (LFI) के नेताओं और समर्थकों के साथ शामिल हुए थे। इस प्रदर्शन में पूर्व येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं, श्रमिक संगठनों और छात्र समूहों ने भी हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने क्रय शक्ति बढ़ाने, सार्वजनिक सेवाओं की सुरक्षा और सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की मांग उठाई।
छात्रों और युवाओं का आंदोलन भी तेज
फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शनों का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। छात्र बेहतर स्कूल भवन, पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, कक्षाओं में सुविधाओं की उपलब्धता और विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव की मांग कर रहे हैं।सितंबर 2026 से शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में फैल गया। छात्रों का आरोप है कि स्कूलों में संसाधनों की कमी और शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। विश्वविद्यालयों में प्रवेश की चयन प्रक्रिया को लेकर भी नाराजगी है।मेलनचोन ने छात्र आंदोलन का समर्थन किया है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में चयन आधारित प्रवेश व्यवस्था समाप्त करने और मतदान की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने का प्रस्ताव भी रखा है। उनका मानना है कि युवाओं को देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए।
सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव
प्रदर्शनों को लेकर फ्रांस की सरकार और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक टकराव भी तेज हो गया है। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू की सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाया है।सरकार की ओर से वामपंथी दलों पर आरोप लगाए गए हैं कि वे विरोध प्रदर्शनों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं मेलनचोन ने सरकार की पुलिस व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों से निपटने के तरीके पर सवाल उठाए हैं।मेलनचोन का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है और सरकार को लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना चाहिए। हालांकि उन्होंने लूटपाट और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों का समर्थन नहीं किया है। उनका तर्क है कि हिंसा से सामाजिक आंदोलन की वास्तविक मांगें कमजोर होती हैं।
सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार सतर्क
फ्रांस में लगातार हो रहे प्रदर्शनों और पहले हुई हिंसक घटनाओं को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। 24 अक्टूबर के राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान 70 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी। पेरिस में प्रदर्शन के मार्ग और सार्वजनिक स्थानों पर भी कई प्रतिबंध लगाए गए थे।फ्रांस के आंतरिक मंत्रालय के मुताबिक, 24 अक्टूबर को देशभर में लगभग 4.10 लाख लोगों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, जबकि श्रमिक संगठनों ने इससे अधिक भागीदारी का दावा किया। प्रदर्शन अधिकांश स्थानों पर शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की घटनाएं भी सामने आईं।31 अक्टूबर को भी फ्रांस के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी रहे। इस दौरान पुलिस ने देशभर में लगभग 70 हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया। आंतरिक मंत्रालय के अनुसार, उस दिन दोपहर तक करीब 15 हजार प्रदर्शनकारी सड़कों पर थे और 27 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
2027 के राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ सकता है असर
फ्रांस में अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। ऐसे में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को आगामी चुनाव के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद देश में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होगी।जीन-ल्यूक मेलनचोन वामपंथी राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वह पहले भी राष्ट्रपति चुनाव लड़ चुके हैं और इस बार भी राष्ट्रपति पद की दौड़ में अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पार्टी युवाओं, श्रमिकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दे रही है।दूसरी ओर, दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और अन्य राजनीतिक उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा विरोध प्रदर्शनों से मेलनचोन को युवाओं और सरकार से असंतुष्ट मतदाताओं के बीच समर्थन मिल सकता है। हालांकि प्रदर्शन में भागीदारी को सीधे चुनावी सफलता में बदलना उनके लिए आसान नहीं होगा।कुल मिलाकर, फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शन केवल महंगाई या शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गए हैं। इनके जरिए नागरिक देश की आर्थिक नीतियों, सार्वजनिक सेवाओं और राजनीतिक नेतृत्व पर भी सवाल उठा रहे हैं। मेलनचोन की सक्रिय भागीदारी ने इन मुद्दों को चुनावी राजनीति के केंद्र में ला दिया है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या कदम उठाती है और विरोध प्रदर्शनों का 2027 के राष्ट्रपति चुनाव पर कितना असर पड़ता है।