वर्ल्ड | अंतरिक्ष में महीनों बिताने के बाद जब सुनीता विलियम्स पृथ्वी पर लौटीं, तो उन्हें एक आम समस्या का सामना करना पड़ा— धुंधली दृष्टि और फोकस करने में दिक्कत। यह सिर्फ उनके साथ नहीं, बल्कि ज़्यादातर अंतरिक्ष यात्रियों के साथ होता है। लेकिन आखिर स्पेस में रहने से आंखों पर असर क्यों पड़ता है?
स्पेस में बदल जाती है बॉडी की सिस्टम
पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण के कारण रक्त संचार सामान्य रूप से होता है, लेकिन अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी के कारण शरीर में फ्लूइड्स (तरल पदार्थ) का प्रवाह ऊपर की ओर बढ़ जाता है, जिससे आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
कैसे प्रभावित होती है नजर?
- आई प्रेशर बढ़ जाता है – स्पेस में द्रव सिर की ओर बढ़ता है, जिससे ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) पर दबाव पड़ता है और आंखों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
- रेटिना पर असर – लगातार बढ़े हुए दबाव के कारण रेटिना में सूजन या हल्का बदलाव आ सकता है, जिससे दृष्टि धुंधली हो जाती है।
- फोकस करने में दिक्कत – आंखें गुरुत्वाकर्षण के अभाव में अलग तरह से एडजस्ट हो जाती हैं, जिससे पृथ्वी पर लौटने पर आंखों को दोबारा सामान्य तरीके से देखने में समय लगता है।
क्या यह असर स्थायी होता है?
अधिकतर मामलों में यह समस्या कुछ हफ्तों में ठीक हो जाती है। अंतरिक्ष यात्री फिजियोथेरेपी की तरह आई एक्सरसाइज़ और एक विशेष डाइट फॉलो करते हैं ताकि उनकी नजर जल्द से जल्द सामान्य हो सके।
इसका हल कैसे निकाला जा रहा है?
नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ इस समस्या को हल करने के लिए स्पेस हेल्थ प्रोग्राम चला रही हैं। अब नए मिशनों में ऐसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है, जिससे आई प्रेशर को नियंत्रित किया जा सके।
क्या मंगल मिशन पर भी होगा ऐसा?
अगर अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक मंगल या किसी अन्य ग्रह की यात्रा करेंगे, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है। इसलिए वैज्ञानिक आधुनिक आई केयर तकनीकों पर शोध कर रहे हैं, ताकि भविष्य में स्पेस विज़न प्रॉब्लम्स को कम किया जा सके।
सुनीता विलियम्स की वापसी के बाद उनके स्वास्थ्य और नजर पर रिसर्च की जाएगी, ताकि आने वाले स्पेस मिशनों को और सुरक्षित बनाया जा सके।