इस्लामाबाद। पाकिस्तान में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक नई रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मीडिया अधिकारों की निगरानी करने वाले संगठन फ्रीडम नेटवर्क (Freedom Network) ने चेतावनी दी है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकते, जब तक उन्हें लागू करने वाले आयोगों को पर्याप्त अधिकार, वित्तीय संसाधन और शिकायतों पर कार्रवाई की बेहतर व्यवस्था नहीं मिलती। रिपोर्ट में कहा गया है कि कानून बनने के बावजूद बड़ी संख्या में पत्रकारों को यह जानकारी नहीं है कि सुरक्षा संबंधी शिकायत कहां और कैसे दर्ज कराई जाए।पाकिस्तानी अखबार 'डॉन' की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रीडम नेटवर्क ने 'फ्रॉम सेफ्टी ऑन पेपर टू सेफ्टी इन प्रैक्टिस' शीर्षक से यह अध्ययन जारी किया है। इसका उद्देश्य पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गठित संघीय और सिंध प्रांत के आयोगों की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करना है।
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में पत्रकारों को धमकियों, हमलों और उत्पीड़न से बचाने के लिए विशेष कानूनी प्रावधान किए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य पत्रकारों के खिलाफ अपराध करने वालों को जवाबदेह बनाना और पीड़ितों को सुरक्षा उपलब्ध कराना है।सिंध में पत्रकार सुरक्षा कानून वर्ष 2021 में पारित हुआ था। इसके बाद संघीय स्तर पर भी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून और संबंधित संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित की गईं।हालांकि, फ्रीडम नेटवर्क का कहना है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। उनका वास्तविक लाभ पत्रकारों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी शिकायत प्रणाली और समय पर कार्रवाई आवश्यक है।
65 फीसदी पत्रकारों को नहीं पता कहां करें शिकायत
इस अध्ययन में सबसे चौंकाने वाली बात पत्रकारों के बीच सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी का अभाव सामने आया है।सर्वेक्षण में शामिल लगभग 70 प्रतिशत पत्रकारों ने बताया कि उन्हें सिंध प्रांत में पत्रकार सुरक्षा कानून होने की जानकारी है।इसके बावजूद 65 प्रतिशत प्रतिभागियों को यह नहीं पता था कि संबंधित सुरक्षा आयोग का कार्यालय कहां स्थित है या उसकी वेबसाइट और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया तक कैसे पहुंचा जाए।रिपोर्ट के अनुसार, कानून की जानकारी होने और वास्तविक सहायता प्राप्त करने के बीच यह अंतर सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी कमजोरी है।
65 फीसदी पत्रकारों ने धमकियां मिलने की बात कही
अध्ययन में शामिल 65 प्रतिशत पत्रकारों ने बताया कि वर्ष 2021 के बाद उन्हें अपने पेशे से संबंधित धमकियों या काम में हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा है।यह निष्कर्ष सिंध के लगभग 40 कामकाजी पत्रकारों पर किए गए सीमित सर्वेक्षण पर आधारित है। इनमें ग्रामीण जिलों के पत्रकार भी शामिल थे।इसलिए इन आंकड़ों को पूरे पाकिस्तान या सिंध प्रांत के सभी पत्रकारों की स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।रिपोर्ट का उद्देश्य सुरक्षा प्रणाली तक पहुंचने में पत्रकारों को आने वाली व्यावहारिक परेशानियों की पहचान करना था।
आयोगों के पास कर्मचारियों और संसाधनों की कमी
रिपोर्ट तैयार करने वाले शोधकर्ता मिनाहिल शहाब और अदनान रहमत ने विभिन्न हितधारकों से बातचीत, साक्षात्कार और ऑनलाइन सर्वेक्षण के माध्यम से जानकारी एकत्र की।अध्ययन में संघीय पत्रकार सुरक्षा आयोग के सामने कर्मचारियों की कमी, सीमित बजट और प्रशासनिक बाधाओं का उल्लेख किया गया है।संघीय आयोग के अध्यक्ष कमाल उद्दीन टीपू ने भी शोध के दौरान इन चुनौतियों की जानकारी दी।वहीं, सिंध में सुरक्षा आयोग का कार्यालय और शिकायतों की सुनवाई की व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद शिकायतों के समाधान में देरी तथा कराची से बाहर सीमित पहुंच जैसी समस्याएं सामने आईं।हालांकि, सिंध आयोग के अध्यक्ष एजाज अहमद मेमन ने पत्रकारों के बीच आयोग पर भरोसे की कमी संबंधी आकलन से असहमति जताई और संस्थान की कार्यप्रणाली में सुधार का उल्लेख किया।
मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी पर भी सवाल
रिपोर्ट में पत्रकारों को रोजगार देने वाले मीडिया संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।सर्वेक्षण में शामिल 51 प्रतिशत पत्रकारों ने बताया कि उनके संस्थानों ने उन्हें सुरक्षा प्रक्रियाओं, आपातकालीन संपर्क, बीमा, कानूनी सहायता या शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था के बारे में जानकारी नहीं दी।सिंध आयोग के अध्यक्ष के अनुसार, 44 मीडिया संस्थानों ने आयोग की ओर से पूछी गई जानकारी का जवाब भी नहीं दिया था।
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए दिए सुझाव
फ्रीडम नेटवर्क ने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षा आयोगों को अधिक अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराने की सिफारिश की है।संगठन ने गोपनीय और आसान शिकायत व्यवस्था, आपातकालीन जोखिम मूल्यांकन, शिकायतों के लिए जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त करने और पुलिस के साथ बेहतर समन्वय की जरूरत बताई है।इसके अलावा मीडिया संस्थानों को पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाने और आयोगों को अपने कामकाज के परिणाम सार्वजनिक करने की सलाह दी गई है।रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार, पुलिस, मीडिया संस्थानों और पत्रकार संगठनों को मिलकर काम करना होगा। केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है।
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