अमेरिकी : राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति और वॉशिंगटन के बदलते रुख के बीच भारत ने अपनी विदेश और व्यापार नीति में बड़ा रणनीतिक बदलाव किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई दिल्ली अब अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने के बजाय यूरोप, एशिया, खाड़ी देशों और दूसरे साझेदारों के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने भी भारत की इसी नीति का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि मोदी एक के बाद एक नए समझौतों और साझेदारियों के जरिए ट्रंप की अनिश्चित नीतियों से पैदा जोखिम को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिकी अखबार ने क्या लिखा?
‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने 29 अगस्त को प्रकाशित अपने विश्लेषण में भारत की रणनीति को अमेरिका के कम भरोसेमंद होते माहौल के बीच अपने विकल्प बढ़ाने की कोशिश के रूप में पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में पीएम मोदी ने कम से कम 20 देशों की आधिकारिक यात्राएं की हैं और भारत नए साझेदार बनाने के साथ पुराने संबंधों को मजबूत करने में जुटा है।
इस रणनीति का मूल विचार बेहद साफ है—भारत किसी एक महाशक्ति या बाजार पर अत्यधिक निर्भर नहीं रहना चाहता। अमेरिका महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेगा, लेकिन उसके साथ-साथ दूसरे देशों से व्यापार, निवेश, तकनीक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाया जाएगा।
इसे अमेरिका से दूरी बनाने के बजाय भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ या कई देशों के साथ समानांतर साझेदारी की नीति के विस्तार के तौर पर समझना ज्यादा सही होगा।
ट्रंप के टैरिफ ने क्यों बढ़ाई भारत की चिंता?
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति ने भारत समेत कई देशों के लिए व्यापारिक अनिश्चितता पैदा की। भारत-अमेरिका संबंधों में भी पिछले करीब एक साल के दौरान टैरिफ, रूसी तेल और व्यापारिक रियायतों जैसे मुद्दों पर तनाव देखने को मिला।
फरवरी 2026 में दोनों देशों ने व्यापार समझौते की घोषणा की थी, जिसके तहत भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ दर को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की बात सामने आई। इसके साथ अगस्त 2025 में रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क को भी हटाने की बात कही गई थी। हालांकि तेल खरीद को लेकर ट्रंप की ओर से किए गए कुछ दावों की भारत ने उसी रूप में सार्वजनिक पुष्टि नहीं की थी।
इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता आसान नहीं रही। जुलाई में रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने जल्दबाजी में समझौता करने के बजाय बेहतर शर्तों के लिए बातचीत जारी रखने का फैसला किया। भारतीय पक्ष कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी ‘रेड लाइन’ से समझौता करने के लिए तैयार नहीं था।
भारत ने कैसे निकाली टैरिफ की काट?
भारत की रणनीति को चार स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला है बाजारों का विविधीकरण। अगर किसी एक बड़े बाजार में टैरिफ या दूसरी व्यापारिक बाधाएं बढ़ती हैं तो भारतीय निर्यातकों के पास दूसरे देशों में कारोबार बढ़ाने के विकल्प होने चाहिए।
दूसरा कदम नए मुक्त व्यापार समझौतों और आर्थिक साझेदारियों का विस्तार है। भारत विकसित और उभरते दोनों तरह के बाजारों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
तीसरा पहलू ऊर्जा सुरक्षा है। भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए अलग-अलग देशों से तेल और गैस खरीदने की नीति अपनाता रहा है। विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ भी यही है कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले किए जाएं।
चौथा पहलू अमेरिका के साथ बातचीत बंद करने के बजाय बेहतर शर्तों के लिए इंतजार करना है। जुलाई में सामने आई रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक नए व्यापारिक साझेदारों और आर्थिक जोखिमों में कमी ने भारतीय वार्ताकारों को अमेरिकी बातचीत में अधिक आत्मविश्वास दिया है।
अमेरिका को छोड़ा नहीं बल्कि विकल्प बढ़ाए
यह समझना जरूरी है कि भारत की बदली रणनीति का मतलब अमेरिका से संबंध तोड़ना नहीं है। अमेरिका आज भी भारत के लिए व्यापार, निवेश, तकनीक और रक्षा जैसे क्षेत्रों में बेहद महत्वपूर्ण साझेदार है।
असल बदलाव यह है कि भारत अब अपने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को ‘अमेरिका या कोई दूसरा देश’ के रूप में नहीं देख रहा। उसकी कोशिश ‘अमेरिका के साथ-साथ दूसरे साझेदार’ जोड़ने की है।
इसी रणनीति को कई विशेषज्ञ ‘अमेरिका प्लस’ के तौर पर भी देख रहे हैं—यानी अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए यूरोप, खाड़ी, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से रिश्तों को समानांतर रूप से मजबूत करना।
यूरोप क्यों हुआ महत्वपूर्ण?
भारत की इस रणनीति में यूरोप की भूमिका तेजी से बढ़ी है। यूरोपीय देशों के लिए भी भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के कारण महत्वपूर्ण बाजार है।
अमेरिकी व्यापार नीति में अनिश्चितता ने भारत और यूरोपीय साझेदारों को एक-दूसरे के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करने का अतिरिक्त कारण दिया है। ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ के एक विश्लेषण में भी ट्रंप की नीतियों के बीच यूरोप के लिए भारत की अहमियत बढ़ने की बात कही गई थी।
भारत के नजरिए से फायदा यह है कि जितने अधिक बड़े बाजार उसके साथ जुड़े होंगे, किसी एक देश के टैरिफ का प्रभाव उतना ही सीमित किया जा सकेगा।
अमेरिका से बातचीत में भारत का रुख क्यों हुआ मजबूत?
रॉयटर्स के मुताबिक भारत ने हाल की अमेरिकी व्यापार वार्ताओं में जल्दबाजी में समझौता करने से इनकार किया और बेहतर शर्तों पर जोर दिया। विशेषज्ञों ने इसके पीछे भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, दूसरे साझेदारों के साथ व्यापारिक विविधीकरण और वैश्विक रणनीतिक स्थिति को महत्वपूर्ण कारण बताया।
यानी रणनीति केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे आर्थिक गणित भी है।
अगर भारत के पास कई निर्यात बाजार, अलग-अलग ऊर्जा आपूर्तिकर्ता और निवेश के कई स्रोत मौजूद हैं, तो किसी एक देश के दबाव में तत्काल फैसला लेने की जरूरत कम हो जाती है।
किसानों और छोटे कारोबारियों पर भी नजर
अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में कृषि लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रही है। भारत के लिए कृषि केवल व्यापार का विषय नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा क्षेत्र है।
इसी वजह से नई दिल्ली ने संकेत दिया है कि किसी समझौते के लिए कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसी रियायत नहीं दी जाएगी जिससे घरेलू हितों को नुकसान पहुंचे। रॉयटर्स की रिपोर्ट में भी भारतीय पक्ष के इसी रुख का उल्लेख किया गया है।
विदेश नीति में असली बदलाव क्या है?
भारत की विदेश नीति पहले भी रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। लेकिन ट्रंप की टैरिफ नीति और अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं ने इस रणनीति को आर्थिक मोर्चे पर और तेज कर दिया है।
अब भारत एक साथ अमेरिका से बातचीत कर सकता है, यूरोप से व्यापार बढ़ा सकता है, रूस के साथ पुराने संबंध बनाए रख सकता है, खाड़ी देशों से आर्थिक सहयोग बढ़ा सकता है और एशियाई देशों के साथ नई साझेदारी विकसित कर सकता है।
हाल के घटनाक्रमों ने एशिया में अमेरिकी विश्वसनीयता को लेकर भी बहस बढ़ाई है। रॉयटर्स के मुताबिक भारत समेत कई एशियाई साझेदार वॉशिंगटन की बदलती और लेन-देन आधारित विदेश नीति को देखते हुए अधिक सतर्क हो रहे हैं।
क्या मोदी की रणनीति सफल हो रही है?
अभी इसे अंतिम सफलता कहना जल्दबाजी होगी। अमेरिका भारतीय उत्पादों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बाजार है और किसी बड़े टैरिफ विवाद का भारतीय निर्यातकों पर असर पड़ सकता है। साथ ही नए बाजार तलाशना रातोंरात संभव नहीं होता।
फिर भी भारत ने एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बनाने की कोशिश जरूर की है—किसी एक देश पर निर्भरता घटाकर विकल्प बढ़ाना।
यही वजह है कि अमेरिकी मीडिया में भी भारत की नई रणनीति चर्चा का विषय बनी है। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ का विश्लेषण इसे ट्रंप की नीतियों से पैदा वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत द्वारा अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने की कोशिश के रूप में देखता है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत अमेरिका से दूरी नहीं बना रहा, बल्कि अपनी विदेश नीति का दायरा बड़ा कर रहा है। ट्रंप के टैरिफ और अनिश्चित फैसलों के बीच मोदी सरकार की रणनीति है—अमेरिका से संबंध बनाए रखो, लेकिन इतने विकल्प तैयार करो कि किसी एक देश का आर्थिक दबाव भारत की विदेश नीति तय न कर सके।
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