आर्कटिक सुरक्षा में बड़ा बदलाव, ग्रीनलैंड में अमेरिका का बढ़ेगा सैन्य दायरा
ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा सुरक्षा समझौता
कोपेनहेगन/वॉशिंगटन: आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी का विस्तार करने जा रहा है। अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच नए सुरक्षा समझौते पर मंगलवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हस्ताक्षर होने हैं। डेनमार्क के मुताबिक इस समझौते से आर्कटिक की सुरक्षा में NATO की व्यापक भूमिका सुनिश्चित होगी और जिम्मेदारी केवल अमेरिका तथा डेनमार्क तक सीमित नहीं रहेगी।
नई व्यवस्था के तहत अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी को मौजूदा एक स्थान से बढ़ाकर तीन स्थानों तक ले जाने की तैयारी कर रहा है। वर्तमान में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी मुख्य रूप से Pituffik Space Base पर है, जहां करीब 150 अमेरिकी सैन्यकर्मी तैनात हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका दक्षिणी ग्रीनलैंड के Narsarsuaq में शीत युद्ध के दौर के एक पुराने सैन्य ठिकाने को फिर से सक्रिय करेगा। यहां अमेरिका पहले Bluie West One सैन्य बेस संचालित करता था। इसके अलावा पूर्वी ग्रीनलैंड के Mestersvig में भी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी स्थापित करने की योजना है। यह स्थान फिलहाल डेनमार्क की विशेष सैन्य इकाई Sirius Dog Sled Patrol के उपयोग में है।
तीनों पक्षों के बीच होने वाले समझौते की पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों का कहना है कि नया समझौता ग्रीनलैंड की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेगा। साथ ही ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को भी बरकरार रखा जाएगा। समझौते पर हस्ताक्षर के बाद आवश्यक राष्ट्रीय संसदीय प्रक्रियाएं पूरी होने पर यह प्रभावी होगा।
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन के अनुसार नई व्यवस्था का उद्देश्य आर्कटिक की सुरक्षा को NATO की व्यापक जिम्मेदारी के दायरे में रखना है। NATO ने भी समझौते का स्वागत किया है। आर्कटिक क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है।
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। यह उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है और आर्कटिक क्षेत्र की निगरानी, मिसाइल चेतावनी तथा अंतरिक्ष संबंधी सैन्य गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिका की यहां सैन्य मौजूदगी नई नहीं है। अमेरिका और डेनमार्क ने 1951 में ग्रीनलैंड की रक्षा से संबंधित समझौता किया था, जो NATO ढांचे से जुड़ा था।
नए समझौते से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर बयानों के कारण अमेरिका और डेनमार्क के संबंधों में तनाव भी देखा गया था। ट्रंप ने नए समझौते को अमेरिकी सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण बताया है। दूसरी तरफ डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने स्पष्ट किया है कि समझौते से ग्रीनलैंड की संप्रभुता अमेरिका को हस्तांतरित नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान होने वाले हस्ताक्षर के बाद समझौते की विस्तृत शर्तें सामने आने की उम्मीद है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इसके तहत अमेरिका की सैन्य मौजूदगी बढ़ेगी और आर्कटिक तथा उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा में NATO की भूमिका और मजबूत होगी।