अगरतला। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को लेकर देश में जारी राजनीतिक बहस के बीच त्रिपुरा की क्षेत्रीय पार्टी टिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा ने भारत के विभाजन और पूर्वोत्तर की ऐतिहासिक सीमाओं का मुद्दा उठाया है। उन्होंने सवाल किया है कि जब पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों की चर्चा होती है, तो केवल कश्मीर पर ही ध्यान क्यों दिया जाता है। पूर्वोत्तर भारत और तत्कालीन त्रिपुरा रियासत से जुड़े ऐतिहासिक क्षेत्रों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।प्रद्योत देबबर्मा ने वर्ष 1947 में हुए देश के विभाजन के प्रबंधन को एक बड़ी ऐतिहासिक और रणनीतिक भूल बताया। उनका कहना है कि उस समय लिए गए फैसलों का असर आज भी पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सामाजिक संरचना और क्षेत्रीय हितों पर दिखाई देता है। उन्होंने केंद्र सरकार से पूर्वोत्तर की सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करने और क्षेत्र के ऐतिहासिक मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान देने की मांग की है।यह विवाद भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे के एक बयान के बाद चर्चा में आया है। दुबे ने कहा कि भारत को केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तक अपनी चर्चा सीमित नहीं रखनी चाहिए, बल्कि चटगांव, सिलहट और नोआखाली जैसे क्षेत्रों के ऐतिहासिक संदर्भ को भी देखना चाहिए। उन्होंने इन क्षेत्रों के विभाजनकालीन फैसलों को लेकर तत्कालीन नेतृत्व पर सवाल उठाए।निशिकांत दुबे के इस बयान का समर्थन करते हुए प्रद्योत देबबर्मा ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत ने विभाजन की भारी कीमत चुकाई है। उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन त्रिपुरा रियासत के बड़े हिस्से पूर्वी पाकिस्तान में चले गए थे और इस प्रक्रिया के दौरान उनकी दादी महारानी कंचन प्रभा देवी को पूरी जानकारी नहीं दी गई थी।
देबबर्मा ने अपने बयान में यह भी कहा कि वर्ष 1947 में केवल कश्मीर का एक हिस्सा ही पाकिस्तान के नियंत्रण में नहीं गया था, बल्कि त्रिपुरा से जुड़े कुछ ऐतिहासिक क्षेत्रों का भी विभाजन हुआ। उन्होंने इसे देश के इतिहास का अत्यंत दुखद दौर बताया। हालांकि, उनके ये दावे ऐतिहासिक व्याख्या और राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़े हैं, जिन पर अलग-अलग मत मौजूद हैं।प्रद्योत देबबर्मा त्रिपुरा के पूर्व राजपरिवार से संबंध रखते हैं और लंबे समय से राज्य के मूल निवासियों के अधिकारों, पहचान तथा भूमि संरक्षण का मुद्दा उठाते रहे हैं। उनकी पार्टी टिपरा मोथा मुख्य रूप से त्रिपुरा के आदिवासी समुदायों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की वकालत करती है।टिपरा मोथा की प्रमुख मांगों में मूल निवासी समुदायों की पहचान सुरक्षित रखना, भूमि अधिकारों को मजबूत करना और स्वायत्त प्रशासन की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना शामिल रहा है। पार्टी ने ग्रेटर टिपरालैंड से जुड़ी मांग भी उठाई है।देबबर्मा का ताजा बयान ऐसे समय सामने आया है, जब पूर्वोत्तर भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा और निगरानी को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। त्रिपुरा की लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र के लोगों के बीच सांस्कृतिक, पारिवारिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं।वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के समय वर्तमान बांग्लादेश का क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान बना था। इसके बाद वर्ष 1971 में बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। इन बदलावों ने पूर्वोत्तर भारत के परिवहन, व्यापार, जनसंख्या और सुरक्षा संबंधी समीकरणों को प्रभावित किया।
भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है। इस सीमा के कुछ हिस्सों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण निगरानी और बाड़ लगाने की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।विदेश मामलों से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने दिसंबर 2025 में प्रस्तुत रिपोर्ट में भारत-बांग्लादेश सीमा प्रबंधन को मजबूत करने की आवश्यकता बताई थी। समिति के मुताबिक, उस समय करीब 864 किलोमीटर सीमा पर बाड़ नहीं लगी थी। समिति ने जहां संभव हो, वहां बाड़ लगाने का काम तेज करने और आधुनिक निगरानी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने की सिफारिश की थी।समिति ने ड्रोन, मोशन सेंसर और उपग्रह आधारित निगरानी प्रणालियों के उपयोग पर भी जोर दिया था। इसके अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास और दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों के बीच समन्वय को बेहतर बनाने की आवश्यकता बताई गई थी।प्रद्योत देबबर्मा के बयान को इसी व्यापक सुरक्षा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर चर्चा करते समय पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।हालांकि, इतिहास से जुड़े क्षेत्रीय दावों और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूदा सीमा द्विपक्षीय समझौतों और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं के आधार पर निर्धारित है। वर्ष 2015 में दोनों देशों ने भूमि सीमा समझौते को लागू करते हुए लंबे समय से लंबित कई सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान किया था।
इसलिए ऐतिहासिक क्षेत्रों पर राजनीतिक चर्चा को वर्तमान में किसी आधिकारिक क्षेत्रीय दावे या सीमा परिवर्तन की सरकारी नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।राजनीतिक दृष्टि से देबबर्मा का बयान महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने कश्मीर केंद्रित राष्ट्रीय बहस में पूर्वोत्तर के ऐतिहासिक अनुभवों को भी शामिल करने की मांग की है। उनका मानना है कि विभाजन के प्रभावों को समझने के लिए केवल पश्चिमी सीमाओं को नहीं, बल्कि पूर्वी सीमाओं और वहां के समुदायों की परिस्थितियों को भी देखना आवश्यक है।गौरतलब है कि देबबर्मा ने हाल में सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने की घोषणा की थी। इसके बाद उन्होंने टिपरा मोथा की केंद्रीय कार्यसमिति में पद लेने से भी इनकार किया। हालांकि, वे पार्टी से जुड़े ऐतिहासिक और जनजातीय मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं।फिलहाल उनके ताजा बयान ने देश के विभाजन, पूर्वोत्तर की ऐतिहासिक सीमाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक नई बहस को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार और संबंधित राजनीतिक दल इन मुद्दों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
Tags: