चीन पर कब्जे का आरोप ईस्ट तुर्किस्तान की निर्वासित सरकार ने UN से मांगी मदद
बीजिंग। निर्वासित ईस्ट तुर्किस्तान सरकार (ETGE) ने 12 अक्टूबर 2026 को उस घटना की 77वीं बरसी मनाई, जिसे संगठन चीन द्वारा ईस्ट तुर्किस्तान पर सैन्य आक्रमण और कब्जे की शुरुआत मानता है। इस अवसर पर संगठन ने संयुक्त राष्ट्र और दुनिया भर की सरकारों से क्षेत्र के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने और स्वतंत्रता बहाल कराने की अपील की। संगठन ने चीन पर लंबे समय से राजनीतिक दमन, सांस्कृतिक प्रतिबंध और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए हैं।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में ETGE ने दावा किया कि 12 अक्टूबर 1949 को चीनी कम्युनिस्ट सेनाओं ने तत्कालीन ईस्ट तुर्किस्तान गणराज्य के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। संगठन के अनुसार, यह घटना पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के केवल 11 दिन बाद हुई थी। ETGE इन घटनाओं को चीन के कब्जे की शुरुआत के रूप में देखता है।
1949 की घटनाओं को लेकर चीन पर गंभीर आरोप
निर्वासित सरकार के अनुसार, 22 दिसंबर 1949 को तत्कालीन ईस्ट तुर्किस्तान गणराज्य को समाप्त कर दिया गया। संगठन का दावा है कि इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र की स्वतंत्र राजनीतिक संस्थाएं खत्म हो गईं और चीन ने वहां अपना प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।ETGE ने इसे सैन्य कब्जा और औपनिवेशिक शासन बताते हुए कहा कि इस घटना ने ईस्ट तुर्किस्तान के राजनीतिक भविष्य को बदल दिया।हालांकि क्षेत्र के इतिहास और उसकी राजनीतिक स्थिति को लेकर चीन तथा ईस्ट तुर्किस्तान के स्वतंत्रता समर्थक संगठनों के बीच गहरा मतभेद है। चीन इस क्षेत्र को शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र के रूप में प्रशासित करता है।
77 वर्षों के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप
ETGE ने अपने बयान में आरोप लगाया कि पिछले 77 वर्षों के दौरान ईस्ट तुर्किस्तान के लोगों को व्यवस्थित राजनीतिक दमन, सांस्कृतिक प्रतिबंधों और अपनी पहचान को बनाए रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।संगठन का कहना है कि चीन की नीतियों का असर उइगर और अन्य तुर्क मूल के समुदायों की सांस्कृतिक, धार्मिक तथा राष्ट्रीय पहचान पर पड़ा है।निर्वासित सरकार ने दावा किया कि चीन की नीतियां क्षेत्र के लोगों की स्वतंत्रता और बुनियादी अधिकारों को प्रभावित कर रही हैं। संगठन ने इन परिस्थितियों को मौजूदा मानवाधिकार संकट से जोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग दोहराई।
उइगर समुदाय के खिलाफ नरसंहार का दावा
ETGE ने आरोप लगाया कि चीन द्वारा लंबे समय से अपनाई जा रही नीतियों के कारण उइगर समुदाय के खिलाफ गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हो रहे हैं। संगठन ने इन घटनाओं को नरसंहार बताते हुए चीन की जवाबदेही तय करने की मांग की है।इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा होती रही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने 2022 की अपनी रिपोर्ट में शिनजियांग में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का उल्लेख किया था और कहा था कि कुछ कार्रवाइयां मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आ सकती हैं।चीन इन आरोपों से इनकार करता रहा है और शिनजियांग से जुड़ी अपनी नीतियों को आतंकवाद एवं चरमपंथ से निपटने के उपाय बताता है।
संयुक्त राष्ट्र से स्वतंत्रता के समर्थन की अपील
ETGE ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया है कि ईस्ट तुर्किस्तान के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता दी जाए। संगठन का कहना है कि क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति और वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों से जुड़े सवालों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाना चाहिए।निर्वासित सरकार ने दुनिया की सरकारों से चीन पर मानवाधिकारों का सम्मान करने के लिए दबाव बनाने की मांग भी की है। संगठन लंबे समय से ईस्ट तुर्किस्तान की स्वतंत्रता बहाल करने का अभियान चला रहा है।
चीन और निर्वासित सरकार के बीच राजनीतिक मतभेद
ईस्ट तुर्किस्तान का मुद्दा चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और उइगर समुदाय के अधिकारों से जुड़ा विवादित विषय है। निर्वासित सरकार क्षेत्र को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की मांग करती है, जबकि चीन शिनजियांग को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है।12 अक्टूबर की बरसी के अवसर पर ETGE ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की अपील की। संगठन ने कहा कि ईस्ट तुर्किस्तान के लोगों की राजनीतिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान और बुनियादी अधिकारों की रक्षा उसके अभियान का प्रमुख उद्देश्य है।