वॉशिंगटन: CIA की एक खुफिया रिपोर्ट में उन देशों की लिस्ट में भारत का नाम भी शामिल था, जहां ओसामा बिन लादेन 1998 में हमले करने की योजना बना रहा था। जारी किए गए इन डॉक्यूमेंट्स में उसके नेटवर्क के पाकिस्तान से कनेक्शन और तालिबान के उसे बाहर निकालने से इनकार करने की जानकारी भी दी गई है।
28 अगस्त, 1998 के आकलन में भारत और पाकिस्तान के साथ-साथ मिस्र, अरब प्रायद्वीप के देशों, युगांडा और संभवतः नाइजीरिया का नाम उन संभावित जगहों के तौर पर लिया गया था, जहां हमले हो सकते थे।
उस जानकारी का स्रोत छिपाया गया है। जो हिस्सा दिखाई दे रहा है, उसमें किसी भारतीय टारगेट, हमले की तारीख या किसी खास ऑपरेशन प्लान का ज़िक्र नहीं है।
'बिन लादेन का आतंकवादी नेटवर्क अभी भी खतरा है' (Bin Ladin Terrorist Network Still a Threat) शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में मौजूद बिन लादेन और अन्य आतंकवादी नेता अमेरिकी हमलों में बच गए थे। उनका कम्युनिकेशन नेटवर्क बरकरार था, कुछ कैंपों में ट्रेनिंग फिर से शुरू हो गई थी और दूसरे कैंपों को दूसरी जगहों पर ले जाया जा रहा था।
इसमें आकलन किया गया था कि बिन लादेन हमले करने के लिए कम से कम 60 देशों में मौजूद लोगों और सहयोगी समूहों की मदद ले सकता था।
यह डॉक्यूमेंट उन 71 'प्रेसिडेंट्स डेली ब्रीफ' (राष्ट्रपति के लिए दैनिक खुफिया रिपोर्ट) में से एक है, जिन्हें CIA डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने 11 सितंबर के हमलों की 25वीं बरसी के मौके पर सार्वजनिक किया है। एजेंसी ने इस कलेक्शन को 9/11 से जुड़े CIA के राष्ट्रपति ब्रीफिंग डॉक्यूमेंट्स का अब तक का सबसे बड़ा सार्वजनिक किया गया कलेक्शन बताया है।
इन डॉक्यूमेंट्स में कंधार बंधक संकट और बिन लादेन से जुड़े आतंकवादियों के साथ पाकिस्तान के व्यवहार का भी ज़िक्र है।
3 जनवरी, 2000 के एक आकलन में कहा गया था कि तालिबान की मंत्रिपरिषद ने पिछले महीने सर्वसम्मति से बिन लादेन को अफगानिस्तान से बाहर न निकालने का फैसला किया था। यह फैसला सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा उसे सौंपने की मांग के बाद लिया गया था।
रिपोर्ट में कहा गया था कि तालिबान के नेताओं ने बिन लादेन को अपनी सुरक्षा बढ़ाने की चेतावनी दी थी, क्योंकि कंधार बंधक संकट का इस्तेमाल उसके खिलाफ ऑपरेशन चलाने के लिए किया जा सकता था। उस हिस्से के कुछ अंश अभी भी छिपाए गए हैं।
इसमें "हाईजैकिंग में इस्लामाबाद की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय संदेह" का भी ज़िक्र किया गया था। आकलन में कहा गया है कि इन संदेहों और पाकिस्तानी नेता परवेज़ मुशर्रफ की इस चिंता के कारण कि आतंकवाद पाकिस्तान में भी फैल सकता है, ऐसा लगता था कि वह किसी नए हमले की स्थिति में बिन लादेन को बाहर निकालने के लिए तालिबान पर दबाव बढ़ाएंगे।
डॉक्यूमेंट में इस्लामाबाद को लेकर संदेह दर्ज किया गया था। इसमें हाईजैकिंग के लिए पाकिस्तान की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गई थी।
27 जून, 2000 की एक रिपोर्ट में बिन लादेन के नेटवर्क पर रोक लगाने की पाकिस्तान की कोशिशों का ज़िक्र किया गया था। इसमें कहा गया कि इस्लामाबाद अंतरराष्ट्रीय दबाव और इस डर, कि कहीं इस्लामिक चरमपंथी पाकिस्तान को अस्थिर न कर दें, दोनों का जवाब दे रहा था।
बिन लादेन के ग्रुप के सदस्यों ने अरब लोगों को दूसरे देशों में भेजने में आ रही दिक्कतों की शिकायत की थी, क्योंकि ऐसा लगता है कि पाकिस्तान से होकर यात्रा करने पर रोक लगाई जा रही थी। इस रिपोर्ट में पेशावर के पास एक छापे के दौरान उत्तरी अफ्रीका के चरमपंथियों के छह साथियों की गिरफ्तारी की जानकारी भी दी गई।
इसी रिपोर्ट में तालिबान की उन शिकायतों का भी ज़िक्र था कि इस्लामाबाद ने वादा किया हुआ गोला-बारूद नहीं पहुँचाया था। इस हिस्से को कुछ हद तक छिपा दिया गया है और इससे यह पता नहीं चलता कि बाद में कोई डिलीवरी हुई या नहीं।
24 फरवरी, 1998 की एक पुरानी रिपोर्ट में कहा गया था कि पाकिस्तान में मौजूद हरकत-उल-अंसार के नेताओं ने मिस्र के चरमपंथी समूहों के साथ मिलकर बिन लादेन के उस फतवे पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें दुनिया भर में अमेरिकी हितों और नागरिकों पर हमले करने का आह्वान किया गया था।
CIA ने कहा कि इस कलेक्शन से अल-कायदा के बारे में एनालिस्ट्स की बदलती समझ और कम, अस्पष्ट और अधूरी जानकारी के बावजूद हमले की योजना के बारे में चेतावनी देने की उनकी कोशिशों का पता चलता है। विश्लेषण के 100 से ज़्यादा पन्ने जारी किए गए।
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