वॉशिंगटन: धरती पर परमाणु शक्ति के मामले में दुनिया की बड़ी ताकतों में शामिल अमेरिका, चीन और रूस की प्रतिस्पर्धा अब चंद्रमा तक पहुंचती दिखाई दे रही है। तीनों देश भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए परमाणु ऊर्जा को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। अमेरिका ने 2030 तक चंद्र सतह पर फिशन रिएक्टर विकसित करने का लक्ष्य रखा है, जबकि चीन और रूस संयुक्त रूप से अपने भावी लूनर बेस के लिए परमाणु ऊर्जा व्यवस्था पर काम कर रहे हैं।

हालांकि इसे चंद्रमा पर परमाणु हथियार तैनात करने की दौड़ समझना सही नहीं होगा। जिन रिएक्टरों की बात हो रही है, उनका मुख्य उद्देश्य बिजली पैदा करना है। भविष्य में चंद्रमा पर लंबे समय तक अंतरिक्ष यात्रियों की मौजूदगी, वैज्ञानिक उपकरणों, रोवर, संचार प्रणाली और बेस को लगातार बिजली देने के लिए भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत की जरूरत होगी।
चंद्रमा पर सौर ऊर्जा की अपनी सीमाएं हैं। चंद्रमा की रात लगभग साढ़े 14 पृथ्वी दिवस तक चल सकती है। इसके अलावा दक्षिणी ध्रुव के कुछ क्षेत्र स्थायी रूप से छाया में रहते हैं। ऐसे स्थानों पर केवल सोलर पैनल के भरोसे लगातार बिजली उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। परमाणु विखंडन आधारित छोटे रिएक्टर सूर्य की रोशनी के बिना भी लगातार बिजली पैदा कर सकते हैं।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और ऊर्जा विभाग ने 2030 तक चंद्र सतह पर फिशन पावर सिस्टम विकसित करने की दिशा में सहयोग बढ़ाया है। नासा के अनुसार ऐसा सिस्टम वर्षों तक बिना ईंधन भरे बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम बनाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल भविष्य के चंद्र बेस, वैज्ञानिक प्रयोगों और दूसरे उपकरणों को ऊर्जा देने में किया जा सकता है।
दूसरी तरफ चीन और रूस भी पीछे नहीं हैं। दोनों देश इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन यानी ILRS की योजना पर मिलकर काम कर रहे हैं। उनकी योजना में चंद्र सतह पर बिजली उत्पादन, संचार और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएं स्थापित करना शामिल है। परमाणु ऊर्जा को इस दीर्घकालिक चंद्र ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
इस प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव है। यहां स्थायी छाया वाले क्रेटरों में पानी की बर्फ मौजूद होने के प्रमाण मिले हैं। भविष्य के मानव अभियानों में पानी का इस्तेमाल पीने के साथ ऑक्सीजन और रॉकेट ईंधन के लिए आवश्यक तत्व हासिल करने में किया जा सकता है। यही वजह है कि दक्षिणी ध्रुव के उपयोगी क्षेत्रों तक पहुंच को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की योजना के साथ सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है। रिएक्टर को पृथ्वी से सुरक्षित तरीके से लॉन्च करना, चंद्रमा तक पहुंचाना और वहां स्थापित करना तकनीकी रूप से बेहद जटिल काम है। लॉन्च दुर्घटना से जुड़े जोखिमों को देखते हुए परमाणु सामग्री के परिवहन के लिए कठोर सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होगी।
चंद्रमा पर रिएक्टर लगने के बाद विकिरण से अंतरिक्ष यात्रियों और संवेदनशील उपकरणों को सुरक्षित रखना भी जरूरी होगा। इसके लिए रिएक्टर को मानव बेस से पर्याप्त दूरी पर लगाने और सुरक्षा क्षेत्र बनाने जैसी व्यवस्थाओं पर विचार किया जा रहा है।
इस दौड़ ने अंतरिक्ष कानून से जुड़े सवाल भी खड़े किए हैं। 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी के तहत कोई देश चंद्रमा को अपनी राष्ट्रीय संपत्ति घोषित नहीं कर सकता। इसलिए भविष्य में किसी रिएक्टर या बेस के आसपास सुरक्षा क्षेत्र बनाया जाता है तो उसके स्वरूप और दूसरे देशों की पहुंच को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल अमेरिका, चीन और रूस में से किसी ने चंद्रमा पर अपना प्रस्तावित परमाणु रिएक्टर स्थापित नहीं किया है। परियोजनाएं विकास और तैयारी के अलग-अलग चरणों में हैं तथा घोषित समयसीमाएं तकनीकी चुनौतियों के कारण बदल भी सकती हैं।
इतना जरूर है कि चंद्रमा पर लंबे समय तक मौजूदगी की योजना ने परमाणु ऊर्जा को अंतरिक्ष कार्यक्रमों के केंद्र में ला दिया है। आने वाले वर्षों में यह प्रतिस्पर्धा केवल चंद्रमा तक पहुंचने की नहीं, बल्कि वहां लगातार बिजली पैदा करने और स्थायी बुनियादी ढांचा खड़ा करने की भी होगी।
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