साइंस डेस्क: अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दुर्लभ दुनिया के संकेत खोजे हैं, जिसने ग्रहों के जन्म को लेकर हमारी समझ में नया अध्याय जोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने एक ऐसे ग्रह की पहचान की है, जो किसी युवा तारे के आसपास मौजूद गैस और धूल से नहीं, बल्कि एक मर चुके तारे द्वारा छोड़े गए पदार्थ से बना है। इसी वजह से इसे ‘सेकंड जेनरेशन प्लैनेट’ यानी दूसरी पीढ़ी का ग्रह कहा जा रहा है। वैज्ञानिक इसे ‘फीनिक्स प्लैनेट’ भी कह रहे हैं, क्योंकि यह अपने तारे की ‘राख’ से दोबारा जन्मी दुनिया जैसा है।
यह ग्रह एक व्हाइट ड्वार्फ तारे HS 0209+0832 के आसपास मौजूद है। व्हाइट ड्वार्फ उस तारे का घना अवशेष होता है, जिसने अपना परमाणु ईंधन खत्म कर दिया हो और अपनी बाहरी गैस तथा धूल अंतरिक्ष में छोड़ दी हो। सामान्य तौर पर ग्रह किसी तारे के जन्म के दौरान उसके आसपास बची गैस और धूल से बनते हैं, लेकिन इस ग्रह का मामला बिल्कुल अलग नजर आ रहा है। University of Warwick के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च के मुताबिक, इस ग्रह का निर्माण उस सामग्री से हुआ जो तारे की मृत्यु के दौरान बाहर निकली थी। यही वजह है कि इसे पहली पीढ़ी के सामान्य ग्रहों से अलग माना जा रहा है। अध्ययन Nature Astronomy में प्रकाशित हुआ है।
इस खोज की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी NASA के Hubble Space Telescope के पुराने आंकड़े बने। वर्ष 1999 में हबल ने HS 0209+0832 का अध्ययन किया था। उस समय करीब 100 रासायनिक संकेतों की पहचान नहीं हो पाई थी। वर्षों बाद वैज्ञानिक जेमी विलियम्स ने नए और बेहतर रासायनिक डेटाबेस की मदद से इन आंकड़ों की दोबारा जांच की।
इस जांच में व्हाइट ड्वार्फ के वातावरण में नायोबियम की असामान्य रूप से अधिक मात्रा मिली। इसके साथ जिंक और कॉपर जैसे भारी तत्वों के संकेत भी सामने आए। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे भारी तत्व तारे के जीवन के अंतिम चरण में विशेष परमाणु प्रक्रियाओं से बनते हैं। इससे संकेत मिला कि आसपास मौजूद ग्रह उसी सामग्री से बना हो सकता है, जिसे तारे ने अपनी मृत्यु के दौरान बाहर फेंका था। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह ग्रह गैसीय विशालकाय है और आकार में बृहस्पति या शनि जैसा हो सकता है। यह अपने व्हाइट ड्वार्फ तारे के बेहद करीब है और सिर्फ 4.4 पृथ्वी दिनों में उसका एक चक्कर पूरा कर लेता है।
तारे के इतनी नजदीक होने की वजह से ग्रह का वातावरण भी सुरक्षित नहीं है। व्हाइट ड्वार्फ से निकलने वाली तीव्र पराबैंगनी किरणें ग्रह की बाहरी गैस को गर्म कर रही हैं। इसके कारण ग्रह का कुछ वायुमंडल अंतरिक्ष में निकल रहा है और फिर उसका पदार्थ वापस व्हाइट ड्वार्फ पर गिर रहा है। यही प्रक्रिया वैज्ञानिकों के लिए बेहद उपयोगी साबित हुई। ग्रह से निकलने वाले पदार्थ के रासायनिक संकेतों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह समझ सके कि यह ग्रह सामान्य ग्रहों की तरह नहीं बना था।
इस खोज से पहले पल्सर जैसे तारकीय अवशेषों के आसपास दूसरी पीढ़ी के ग्रह बनने की संभावना जताई गई थी, लेकिन किसी व्हाइट ड्वार्फ के आसपास इस तरह की दुनिया का इतना मजबूत संकेत पहली बार मिला है। वैज्ञानिक अभी भी इसे एक ‘कैंडिडेट’ मान रहे हैं और आगे James Webb Space Telescope जैसे शक्तिशाली उपकरणों से इसकी पुष्टि करने की योजना है। इस खोज का महत्व सिर्फ एक अनोखे ग्रह तक सीमित नहीं है। इससे यह संभावना भी सामने आई है कि किसी तारे की मौत के बाद उसका ग्रह तंत्र पूरी तरह खत्म होना जरूरी नहीं है। मरते हुए तारे से निकली गैस और धूल बाद में फिर एक डिस्क बना सकती है और उसी से नए ग्रहों का जन्म हो सकता है।
वैज्ञानिक अब दूसरे व्हाइट ड्वार्फ तारों के आसपास भी नायोबियम, कार्बन और अन्य भारी तत्वों के ऐसे ही संकेत खोजने की योजना बना रहे हैं। इससे पता चल सकता है कि ब्रह्मांड में दूसरी पीढ़ी के ग्रह वास्तव में कितने सामान्य हैं।
इस खोज ने हमारे अपने सौरमंडल को लेकर भी रोचक सवाल खड़ा किया है। लगभग पांच अरब वर्षों बाद सूर्य भी अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुंचकर रेड जायंट बनेगा और फिर व्हाइट ड्वार्फ में बदल जाएगा। वैज्ञानिकों के सामने अब सवाल है कि क्या कभी भविष्य में सूर्य द्वारा छोड़ी गई सामग्री से भी कोई नई दुनिया जन्म ले सकती है। फिलहाल ‘फीनिक्स प्लैनेट’ की खोज इस बात का संकेत है कि किसी तारे की मृत्यु उसके ग्रह तंत्र की कहानी का आखिरी अध्याय जरूरी नहीं है। कभी-कभी उसी अंत से एक बिल्कुल नई दुनिया की शुरुआत भी हो सकती है।
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