डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन पर ही क्यों मनाते हैं Teachers' Day जानें पूरी कहानी
राष्ट्रपति तक ऐसा था डॉ. राधाकृष्णन का सफर
लाइफस्टाइल : भारत में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन महान शिक्षाविद और देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को समर्पित है। शिक्षक दिवस पर विद्यार्थी अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करते हैं। भारतीय संत परंपरा में भी गुरु को अत्यंत ऊंचा स्थान दिया गया है। संत कबीर दास ने अपने कई दोहों में गुरु की महिमा, ज्ञान और सही मार्गदर्शन का महत्व सरल शब्दों में समझाया है।
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े...
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
अर्थ: कबीर दास कहते हैं कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण स्पर्श किए जाएं? कबीर गुरु को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि गुरु ने ही उन्हें भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताया। यह दोहा जीवन में गुरु के महत्व को दर्शाता है।
2. सब धरती कागद करूं...
सब धरती कागद करूं, लेखनि सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय॥
अर्थ: कबीर कहते हैं कि यदि पूरी धरती को कागज, सभी जंगलों को कलम और सातों समुद्रों के पानी को स्याही बना दिया जाए, तब भी गुरु के गुणों और उपकारों का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। यानी गुरु की महिमा अनंत है।
3. गुरु कुम्हार शिष कुंभ है...
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट॥
अर्थ: इस दोहे में गुरु की तुलना कुम्हार और शिष्य की तुलना मिट्टी के घड़े से की गई है। जिस तरह कुम्हार घड़े को सही आकार देने के लिए बाहर से चोट देता है और अंदर से हाथ का सहारा देता है, उसी तरह गुरु शिष्य की गलतियां सुधारते हुए उसे भीतर से सहारा देता है। शिक्षक की डांट के पीछे भी विद्यार्थी को बेहतर बनाने की भावना हो सकती है।
4. गुरु बिन ज्ञान न उपजै...
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥
अर्थ: इस दोहे का भाव है कि सच्चे गुरु के मार्गदर्शन के बिना वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना कठिन है। गुरु व्यक्ति को सत्य और असत्य का अंतर समझाता है और उसकी कमियों को दूर करने में सहायता करता है।
5. कबीर ते नर अंध हैं...
कबीर ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥
अर्थ: कबीर गुरु की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि गुरु को साधारण व्यक्ति समझना अज्ञान है। उनके अनुसार ईश्वर से दूरी होने पर गुरु मार्ग दिखा सकता है, लेकिन यदि व्यक्ति गुरु के मार्गदर्शन और ज्ञान को ही ठुकरा दे तो उसे सही दिशा मिलना कठिन हो जाता है।
6. यह तन विष की बेलरी...
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
अर्थ: कबीर इस दोहे के जरिए बताते हैं कि मनुष्य के भीतर अनेक विकार हो सकते हैं, जबकि सच्चा गुरु ज्ञानरूपी अमृत का स्रोत है। ऐसे गुरु से मिलने वाला ज्ञान इतना मूल्यवान है कि उसके सामने बड़े से बड़ा त्याग भी छोटा माना गया है।
7. सतगुरु की महिमा अनंत...
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार॥
अर्थ: सच्चा गुरु शिष्य के ज्ञान के नेत्र खोलता है। वह उसे केवल बाहरी दुनिया नहीं दिखाता बल्कि स्वयं को समझने और सही-गलत पहचानने की दृष्टि भी देता है। इसलिए गुरु के उपकारों को सीमित शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।
शिक्षक दिवस पर क्यों खास हैं कबीर के दोहे?
संत कबीर के ये दोहे सदियों पुराने होने के बावजूद आज के शिक्षक-विद्यार्थी संबंध पर भी लागू होते हैं। शिक्षक केवल किताबों के अध्याय नहीं पढ़ाता, बल्कि अनुशासन, आत्मविश्वास, सही निर्णय और जीवन मूल्यों की सीख भी दे सकता है।
Teachers' Day 2026 पर इन दोहों को स्कूल या कॉलेज के भाषण, शुभकामना संदेश और सोशल मीडिया पोस्ट में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि कबीर के दोहों के शब्द अलग-अलग संकलनों और मौखिक परंपराओं में कुछ भिन्न रूपों में भी मिलते हैं।
शिक्षक दिवस हमें याद दिलाता है कि जीवन में सही गुरु या शिक्षक का मार्गदर्शन व्यक्ति की सोच और भविष्य दोनों बदल सकता है। कबीर का संदेश भी यही है कि ज्ञान देने वाले गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता जीवनभर बनाए रखनी चाहिए।