ज्योतिष न्यूज़: नवरात्र नौ दिन और बंगाल में दुर्गा पूजा पांच दिन, आखिर ऐसा क्यों? दोनों में मां दुर्गा की आराधना होती है। दोनों आश्विन मास में आते हैं और दोनों का संबंध शक्ति की उपासना से है। फिर उत्तर भारत में प्रतिपदा से शुरू होने वाली पूजा नौ दिनों तक चलती है, जबकि बंगाल में दुर्गा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा षष्ठी से विजयादशमी तक पांच दिनों में पूरा होता है।
दरअसल, इसका जवाब सिर्फ दिनों की गिनती में नहीं, बल्कि देवी आराधना की अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में छिपा है। देवी एक हैं, लेकिन भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी उपासना ने अलग स्वरूप ग्रहण किया है।
नवरात्र में नौ दिन क्यों?
‘नवरात्र’ नाम ही इसकी अवधि का संकेत देता है, नौ रातें। देवी उपासना की परंपरा में वर्ष के अलग-अलग समय में नवरात्र मनाए जाते हैं, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्र सबसे अधिक प्रचलित हैं।
शारदीय नवरात्र आश्विन मास की प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलता है। उत्तर भारत में इन नौ दिनों को देवी के नौ स्वरूपों की आराधना से जोड़ा जाता है। पहले दिन शैलपुत्री और इसके बाद क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होती है।
हर दिन देवी के एक स्वरूप को समर्पित होने के कारण नौ दिनों का अपना अलग धार्मिक महत्व है। घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ नवरात्र की शुरुआत होती है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और अष्टमी अथवा नवमी को कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है।
इस तरह नवरात्र के नौ दिन केवल उत्सव की अवधि नहीं, बल्कि देवी के नौ स्वरूपों की क्रमिक आराधना से जुड़ी धार्मिक परंपरा हैं।
बंगाल में दुर्गा पूजा पांच दिन क्यों?
बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपरा का स्वरूप कुछ अलग है। यहां भी देवी की आराधना की प्रक्रिया व्यापक है, लेकिन मुख्य पूजा षष्ठी से दशमी तक होती है। इसी कारण आम तौर पर दुर्गा पूजा को पांच दिनों का मुख्य उत्सव कहा जाता है।
षष्ठी के दिन देवी के बोधन के साथ मुख्य अनुष्ठान शुरू होते हैं। सप्तमी को नवपत्रिका पूजा होती है। अष्टमी का दिन महाअष्टमी के रूप में विशेष महत्व रखता है। अष्टमी और नवमी के संधिकाल में होने वाली संधि पूजा दुर्गा पूजा के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में शामिल है।
इसके बाद महानवमी और फिर विजयादशमी आती है। दशमी को मां दुर्गा को विदाई दी जाती है और प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। इस तरह षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी, ये पांच दिन बंगाल की दुर्गा पूजा के मुख्य दिन हैं।
क्या बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ पांच दिन की है?
यहीं एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। दुर्गा पूजा को पांच दिनों का कहना उसके मुख्य अनुष्ठानों के संदर्भ में है। पूजा से जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां इससे पहले ही शुरू हो जाती हैं।
महालया का बंगाल की दुर्गा पूजा से गहरा संबंध है। पितृपक्ष की समाप्ति के आसपास आने वाला महालया देवी पक्ष के आगमन का संकेत देता है। बंगाली समाज में महालया के साथ ही मां दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा और अधिक प्रबल हो जाती है।
इसके बाद पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंचती हैं और षष्ठी से मुख्य अनुष्ठान शुरू होते हैं। इसलिए नवरात्र के नौ दिनों और दुर्गा पूजा के पांच मुख्य दिनों की सीधी तुलना करते समय यह समझना जरूरी है कि दोनों की धार्मिक गणना और अनुष्ठानिक परंपरा अलग-अलग है।
दुर्गा सप्तशती दोनों को कैसे जोड़ती है?
नवरात्र और दुर्गा पूजा की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भले अलग हो, लेकिन दोनों के बीच धार्मिक समानताएं भी हैं।
मार्कण्डेय पुराण का प्रसिद्ध अंश देवी माहात्म्य देवी उपासना की महत्वपूर्ण धार्मिक रचनाओं में से एक है। इसे दुर्गा सप्तशती या चंडी पाठ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें देवी के विभिन्न स्वरूपों, असुरों के साथ उनके युद्ध और महिषासुर पर विजय का वर्णन मिलता है।
उत्तर भारत में नवरात्र के दौरान दुर्गा सप्तशती के पाठ की परंपरा है, जबकि बंगाल की दुर्गा पूजा में चंडी पाठ का विशेष महत्व है। यानी पूजा की पद्धतियां अलग होने के बावजूद शक्ति और देवी की विजय की अवधारणा दोनों परंपराओं को एक सूत्र में बांधती है।
बंगाल में कैसे भव्य होती गई दुर्गा पूजा?
बंगाल में देवी दुर्गा की आराधना की परंपरा पुरानी है, लेकिन आज जिस विशाल सार्वजनिक स्वरूप में दुर्गा पूजा दिखाई देती है, वह समय के साथ विकसित हुआ।
विशेष रूप से 18वीं शताब्दी में बंगाल के जमींदारों और संपन्न परिवारों में भव्य दुर्गा पूजा के आयोजन सामाजिक प्रतिष्ठा और सामुदायिक मेल-मिलाप के महत्वपूर्ण अवसर बनने लगे। बाद में बारोवारी यानी सामुदायिक पूजा की परंपरा का विस्तार हुआ और दुर्गा पूजा राजबाड़ियों तथा संपन्न परिवारों के परिसरों से निकलकर बड़े सार्वजनिक आयोजन का रूप लेने लगी।
आज बंगाल की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। पंडालों की थीम, प्रतिमा निर्माण, कला, रोशनी, ढाक, धुनुची नृत्य, खानपान और लाखों लोगों की भागीदारी इसे धार्मिक होने के साथ विशाल सांस्कृतिक आयोजन भी बनाती है।
दिसंबर 2021 में इसे वैश्विक पहचान भी मिली, जब यूनेस्को ने ‘Durga Puja in Kolkata’ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।
नवरात्र और दुर्गा पूजा में असली अंतर क्या?
दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर पूजा की पद्धति और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का है। नवरात्र में नौ दिनों की साधना और नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की क्रमिक आराधना प्रमुख है। व्रत, कलश स्थापना, दुर्गा सप्तशती पाठ और कन्या पूजन इसकी प्रमुख परंपराओं में शामिल हैं।
बंगाल की दुर्गा पूजा में षष्ठी से दशमी तक देवी दुर्गा की प्रतिमा के सामने विशिष्ट अनुष्ठान होते हैं। मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की प्रतिमाएं स्थापित करने की परंपरा भी इसकी खास पहचान है। ढाक की गूंज, पुष्पांजलि, संधि पूजा, धुनुची नृत्य, सिंदूर खेला और अंत में प्रतिमा विसर्जन इसके सांस्कृतिक स्वरूप को अलग बनाते हैं।
इसलिए नवरात्र और दुर्गा पूजा को पूरी तरह अलग पर्व कहना भी इनके साझा धार्मिक आधार को नजरअंदाज करना होगा और दोनों को बिल्कुल एक जैसा मानना भी उनकी अलग-अलग परंपराओं को समझने में चूक होगी।
मूल में दोनों शक्ति की आराधना हैं। फर्क आराधना की पद्धति और उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का है। एक परंपरा में नौ दिनों तक देवी के नौ स्वरूपों की साधना होती है, तो दूसरी में षष्ठी से विजयादशमी तक मां दुर्गा की आराधना अपने विशिष्ट बंगाली स्वरूप में सामने आती है। देवी एक, आस्था एक, लेकिन आराधना के रंग अनेक।