Shani Amavasya Vrat Katha: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को विशेष महत्व दिया गया है। अमावस्या तिथि पितृ तर्पण, स्नान-दान और पूजा-पाठ के लिए शुभ मानी जाती है। शनि अमावस्या के दिन इस पर्व की कथा अवश्य पढ़नी या सुननी चाहिए, तभी इसका फल प्राप्त होता है।
विभिन्न पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, सूर्य देव की दो पत्नियाँ थीं, संज्ञा और छाया। संज्ञा भगवान विश्वकर्मा की पुत्री थीं। जब उनका विवाह सूर्य देव से हुआ, तो वे सूर्य का तेज सहन नहीं कर पा रही थीं। एक दिन देवी संज्ञा अपनी प्रतिरूप छाया को लेकर आईं और उन्हें अपने यहाँ रहने के लिए कहा। छाया सूर्य देव की पत्नी के रूप में रहने लगीं। दूसरी ओर, संज्ञा स्वयं अश्व का रूप धारण करके पृथ्वी पर आईं और विचरण करने लगीं।
छाया भी सूर्य देव का तेज सहन नहीं कर पा रही थीं। एक दिन जब सूर्य देव संतान प्राप्ति की इच्छा से छाया के पास आए, तो उनका तेज देखकर छाया का रंग काला पड़ गया और वे गर्भवती हो गईं। शनिदेव का जन्म छाया के पुत्र के रूप में हुआ था। जिस दिन शनिदेव का जन्म हुआ, उस दिन शनिवार और अमावस्या तिथि थी। इसलिए धार्मिक दृष्टि से शनि अमावस्या का विशेष महत्व है।
शनिदेव को देखकर सूर्यदेव क्रोधित हो गए क्योंकि उनका रंग काला था। सूर्यदेव ने संज्ञा से कहा कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। इसके बाद सूर्यदेव को यह भी पता चला कि उनकी पत्नी छाया लंबे समय से संज्ञा के स्थान पर रह रही हैं। यह सत्य जानकर सूर्यदेव और भी क्रोधित हुए और छाया व शनिदेव को छोड़कर अपनी पहली पत्नी संज्ञा की खोज में निकल पड़े।
जब शनिदेव बड़े हुए, तो उन्होंने स्वयं को सूर्यदेव से भी अधिक प्रभावशाली और शक्तिशाली बनाने की प्रतिज्ञा की और भगवान शिव की तपस्या करने लगे। शिव जी शनिदेव की तपस्या से प्रसन्न हुए और शनिदेव को ग्रहों में न्यायाधीश और दंडाधिकारी का पद प्रदान किया। शिव जी ने उन्हें यह भी आशीर्वाद दिया कि हे शनि, नवग्रहों में तुम्हारा विशेष स्थान और सम्मान होगा। तीनों लोकों में तुम्हारे न्याय से कोई नहीं बच पाएगा। आप सभी जीवों के कर्मों को देखकर न्याय करेंगे।
भगवान शिव से वरदान प्राप्त करने के बाद, शनिदेव नवग्रहों में से एक बन गए और उनकी पूजा की जाने लगी। शनि अमावस्या के दिन शनि की कथा पढ़ना शुभ होता है और कर्मों से उच्च पद प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।