जुलाई में केवल 4 शुभ दिन, देखें शादी के शुभ मुहूर्त

Update: 2026-07-02 12:41 GMT
July Vivah Muhurt ज्योतिष न्यूज़: हिंदू धर्म में विवाह को 16 संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक माना गया है। यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच जीवनभर का पवित्र बंधन होता है। इसलिए विवाह जैसे मांगलिक कार्य को शुभ तिथि और शुभ मुहूर्त में संपन्न करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुभ ग्रह-नक्षत्रों के संयोग में किया गया विवाह दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।
जुलाई 2026 में विवाह के लिए बहुत कम शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इसी महीने चातुर्मास का आरंभ हो जाएगा। चातुर्मास शुरू होने के बाद विवाह समेत अधिकांश मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। ऐसे में यदि आप जुलाई में शादी की योजना बना रहे हैं तो इन शुभ तिथियों की जानकारी पहले से कर लेना आवश्यक है।
जुलाई 2026 के विवाह मुहूर्त
1 जुलाई 2026 (बुधवार): सुबह 6:51 बजे से शाम 4:04 बजे तक।
6 जुलाई 2026 (सोमवार): रात 1:41 बजे से 7 जुलाई सुबह 5:29 बजे तक।
7 जुलाई 2026 (मंगलवार): सुबह 5:29 बजे से दोपहर 2:31 बजे तक।
11 जुलाई 2026 (शनिवार): रात 12:05 बजे से 12 जुलाई सुबह 5:32 बजे तक\
विवाह में शुभ मुहूर्त का महत्व
वैदिक ज्योतिष में विवाह के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जब तिथि, नक्षत्र, वार, योग, करण और लग्न अनुकूल होते हैं, तब विवाह संस्कार सकारात्मक ऊर्जा के बीच संपन्न होता है। इसी कारण विवाह की तिथि तय करते समय वर-वधू की जन्म कुंडली का भी मिलान किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ मुहूर्त में संपन्न विवाह से दांपत्य जीवन में प्रेम, सामंजस्य और स्थिरता बनी रहती है। साथ ही भविष्य में आने वाली कई संभावित बाधाओं का प्रभाव भी कम माना जाता है। इसलिए विवाह की तिथि चुनते समय योग्य ज्योतिषाचार्य की सलाह लेना उचित माना जाता है।
चातुर्मास कब से शुरू होगा?
वर्ष 2026 में 25 जुलाई से चातुर्मास का आरंभ होगा और इसका समापन 20 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी के दिन होगा। धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी चार महीने की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन और अन्य शुभ एवं मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और आध्यात्मिक साधना को विशेष महत्व दिया जाता है।
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