Lord Vishnu: गुरुवार की शाम इस विधि से करें भगवान विष्णु की पूजा, वैवाहिक जीवन की परेशानियां होंगी दूर

Update: 2025-04-24 05:57 GMT
Lord Vishnu: हिंदू धर्म में गुरुवार की उपासना का विशेष महत्व है, क्योंकि यह भगवान विष्णु की कृपा पाने का दिन है। मान्यता है कि गुरुवार को प्रभु की पूजा-अर्चना करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और सभी पापों से मुक्ति भी मिलती हैं। ज्योतिष में गुरुवार का संबंध देवगुरु बृहस्पति से माना जाता है। कहते हैं कि गुरुवार के दिन पूजा, पाठ, हवन, दान और अन्य शुभ कार्य करने से कुंडली में देवगुरु बृहस्पति की स्थिति मजबूत होती हैं। यदि कुंडली में गुरु मजबूत होता है, तो साधक के विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, क्योंकि देवगुरु बृहस्पति विवाह सुख के कारक ग्रह है। ऐसे में गुरुवार की शाम को विधि-विधान से भगवान विष्णु की उपासना करने से आर्थिक तंगी, व्यापार में हानि व नौकरी से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। इसके अलावा वैवाहिक जीवन भी सुखमय बनता है। आइए इस दिन की संपूर्ण पूजा विधि के बारे में जानते हैं।
गुरुवार की पूजा विधि
गुरुवार के दिन पूजा करने से पहले पीले रंग के साफ वस्त्र धारण कर लें।
इसके बाद अब पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें।
फिर पूजा स्थल पर श्री हरि विष्णु की मूर्ति को स्थापित करते हुए प्रभु को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें।
पीली फूल माला और कुछ फूल चढ़ाएं।
अब प्रभु को अक्षत और केले का फल अर्पित करें।
फिर शुद्ध देसी घी का दीप जलाकर कुछ विष्णु जी के मंत्रों का जप करें।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ।
अंत में आरती करें।
यदि संभव हो, तो जरुरतमंदों को दान-दक्षिणा दें।
भगवान विष्णु की आरती:
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥
बृहस्पति देव की आरती:
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा।
छिन-छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
श्री बृहस्पतिवार की आरती- ॐ जय बृहस्पति देवा-
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा।
छिन-छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी।। ॐ जय बृहस्पति देवा।।
विष्णु गायत्री मंत्र:
ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
मंगलम भगवान विष्णुः, मंगलम गरुणध्वजः। मंगलम पुण्डरी काक्षः, मंगलाय तनो हरिः॥
विष्णु स्तुति :
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्ण शुभांगम् ।
लक्ष्मीकांत कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्व लौकेक नाथम् ॥
यं ब्रह्मा वरुणैन्द्रु रुद्रमरुत: स्तुन्वानि दिव्यै स्तवैवेदे: ।
सांग पदक्रमोपनिषदै गार्यन्ति यं सामगा: ।
ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यति यं योगिनो
यस्यातं न विदु: सुरासुरगणा दैवाय तस्मै नम: ॥
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