जनता से रिश्ता वेबडेस्क:   चैत्र हो या शारदीय नवरात्र मातारानी की पूजा में जौ जरूर अर्पित क‍िए जाते हैं। इसके अलावा नवरात्र में जौ बोने की परंपरा भी सद‍ियों से चली आ रही है। तो आइए जान लेते हैं क‍ि नवरात्र पूजा में जौ का क्‍या महत्‍व है साथ ही कलश में इसका प्रयोग क्‍यों क‍िया जाता है?

जौ को ब्रह्म का माना गया है रूप
धर्मग्रंथों की मानें तो जौं को ब्रह्म माना गया है। कहा जाता है कि आदिकाल से पूजा-पाठ में हवन के दौरान जौ को आहुति देने की परंपरा चली आ रही है। इसके अलावा पूजा-पाठ में इसका सम्‍मान करने का अर्थ है कि हमें अन्‍न यानी कि जो ब्रह्म स्‍वरूप है उसका सम्‍मान करना चाहिए। इसका प्रयोग ही इसकी महत्‍ता को स्‍पष्‍ट करता है।
जौ का बढ़ना देता है कई बातों का संकेत
नवरात्र के दौरान जौ बोने की परंपरा तो सदियों पुरानी है। लेकिन इसके साथ ही कुछ और बातें भी जुड़ी हैं। मसलन जौ जातक के भविष्‍य में आने वाले संकेतों को भी दर्शाती है। मान्‍यता है कि नवरात्र के दौरान बोई गई जौ जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे ही मां की कृपा भी बरसती है। इसके अलावा जौ जितनी हरी-भरी होगी। दुर्गा मां की कृपा से जातक के घर में उतनी ही सुख-समृद्धि आती है।
दिनों पर निर्भर है जौ के कुछ संकेत

मान्‍यता है क‍ि नवरात्र के दौरान बोई गई जौ यदि 2 से 3 दिन में ही अंकुरित हो जाए तो यह शुभ संकेत होता है। लेकिन इतने दिनों में यदि जौ न उगे तो यह जातक के लिए अशुभ संकेत माना जाता है। हालांकि कई बार ठीक तरह से जौ न बोने से भी ऐसा हो सकता है। इसलिए कलश में जौ को बहुत अच्‍छे से बोया जाता है।
जौ के रंग से जानें शुभ-अशुभ
मान्यता के अनुसार, नवरात्र के दिनों में बोये गए जौ के रंग से भी शुभ-अशुभ संकेत मिलते हैं। ज्‍योतिषियों की मानें तो यदि जौ के ऊपर का आधा हिस्‍सा हरा हो और नीचे से आधा हिस्‍सा पीला तो इससे आने वाले साल का पता चलता है। यानी कि इस रंग की जौ होने का आशय है कि आने वाले साल में आधा समय अच्‍छा होगा और आधा समय परेशानियों और दिक्‍कतों से भरा होगा। इसके अलावा अगर जौ का रंग हरा हो या फिर सफेद हो गया हो, तो इसका अर्थ होता है कि आने वाला साल काफी अच्‍छा जाएगा। यही नहीं देवी भगवती की कृपा से आपके जीवन में अपार खुशियां और समृद्धि का वास होगा।
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