धर्म : धनतेरस के साथ ही पांच दिवसीय दीपोत्सव की शुरुआत हो गई है। देशभर में सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ माता लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और धन के देवता कुबेर की विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। इसी अवसर पर मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित प्राचीन कुबेर मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां धनतेरस पर भगवान कुबेर के दर्शन और विशेष पूजा के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान कुबेर अकेले नहीं, बल्कि भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश के साथ शिव पंचायत में विराजमान हैं।
मंदसौर शहर के खिलचीपुरा क्षेत्र में स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक विरासत और प्राचीन प्रतिमाओं के कारण प्रसिद्ध है। यह मंदिर विश्वप्रसिद्ध भगवान पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मान्यता है कि देश में केदारनाथ के अलावा मंदसौर का यह एक ऐसा प्रमुख स्थान है, जहां भगवान शिव की पंचायत में धन के देवता कुबेर भी विराजमान हैं। यही कारण है कि धनतेरस के अवसर पर इस मंदिर का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
धनतेरस पर मंदिर में सुबह से ही विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष 6 नवंबर को ब्रह्म मुहूर्त में सुबह चार बजे से भगवान शिव और कुबेर देव के महाभिषेक, विशेष शृंगार और पूजा-अर्चना के कार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाने हैं। श्रद्धालु भगवान कुबेर के दर्शन कर परिवार की सुख-शांति, आर्थिक उन्नति और व्यापार में समृद्धि की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष और धन-संपत्ति का अधिपति माना जाता है। हिंदू धर्म में धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी के साथ भगवान कुबेर की पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर घर में सुख-समृद्धि आती है और आर्थिक परेशानियों से मुक्ति मिलती है। इसी आस्था के कारण श्रद्धालु दूर-दूर से मंदसौर स्थित इस प्राचीन मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं।
मंदिर की एक और बड़ी विशेषता यहां स्थापित भगवान कुबेर की प्राचीन प्रतिमा है। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, धौलागढ़ महादेव मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना माना जाता है, जबकि भगवान कुबेर की प्रतिमा सातवीं शताब्दी के उत्तर गुप्तकाल की बताई जाती है। लगभग तीन फीट ऊंची इस प्रतिमा में भगवान कुबेर को चार भुजाओं और बड़े उदर के साथ दर्शाया गया है। प्रतिमा में उनके एक हाथ में धन की थैली और दूसरे हाथ में पात्र दिखाई देता है। प्रतिमा में नेवले का अंकन भी मिलता है। बताया जाता है कि वर्ष 1978 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान इस प्रतिमा की पहचान भगवान कुबेर के रूप में की गई थी।
स्थानीय इतिहास के अनुसार, मराठा शासनकाल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था। उसी दौरान प्राचीन कुबेर प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया गया। मंदिर में भगवान शिव के साथ माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। शिव परिवार और कुबेर देव की एक साथ उपस्थिति इस धार्मिक स्थल को विशेष पहचान देती है।
इस प्राचीन मंदिर को लेकर कई रोचक लोकमान्यताएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर किसी दूसरे स्थान से उड़कर यहां आया था। इसके अलावा मंदिर की नींव को लेकर भी कई कहानियां सुनाई जाती हैं। हालांकि इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। मंदिर का प्राचीन स्थापत्य और निर्माण शैली इतिहास तथा पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी आकर्षण का विषय है।
मंदिर के बारे में एक प्रचलित मान्यता यह भी है कि इसके गर्भगृह में कभी ताला नहीं लगाया जाता। श्रद्धालु इसे भगवान कुबेर की कृपा और मंदिर की विशिष्ट धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखते हैं। इसी विशेषता के कारण इसे कुबेर देव के अनूठे मंदिरों में गिना जाता है।
मंदसौर का संबंध पौराणिक कथाओं से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय मान्यताओं में इस नगर को लंकापति रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। इसी कारण मंदसौर को रावण की ससुराल भी कहा जाता है। हालांकि यह धार्मिक और लोकपरंपराओं से जुड़ी मान्यता है। भगवान कुबेर को पौराणिक कथाओं में रावण का सौतेला भाई बताया गया है। ऐसे में मंदसौर स्थित कुबेर मंदिर से जुड़ी धार्मिक कथाएं श्रद्धालुओं की उत्सुकता को और बढ़ाती हैं।
धनतेरस के अवसर पर सोना, चांदी, बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी को शुभ माना जाता है। इसके साथ ही भगवान धन्वंतरि से आरोग्य, माता लक्ष्मी से समृद्धि और भगवान कुबेर से धन-संपदा की कामना की जाती है। मंदसौर के धौलागढ़ महादेव मंदिर में श्रद्धालु इसी विश्वास के साथ पहुंचते हैं कि भगवान शिव और कुबेर देव के संयुक्त दर्शन से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
पांच दिवसीय दीपोत्सव के पहले दिन इस प्राचीन मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। भगवान कुबेर की दुर्लभ प्रतिमा, शिव परिवार की एक साथ उपस्थिति, सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं और मंदिर से जुड़ी लोककथाएं इसे विशेष बनाती हैं। यही वजह है कि धनतेरस पर मंदसौर का यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहता है।