जज ने जमानत रिजेक्टेड कहा तो कर्मचारी ने लिखा अलाउड, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बदलने से किया इनकार

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Update: 2026-01-19 02:03 GMT

पटना/दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि कोर्ट हस्ताक्षर किए गए आदेश को रद्द नहीं कर सकते, गलती कितनी भी अजीब क्यों न हो? सुप्रीम कोर्ट ने नारकोटिक्स केस में आरोपी एक व्यक्ति की जमानत फिर से बहाल कर दी है। शीर्ष अदालत ने माना कि पटना हाईकोर्ट ने पहले से दी गई बेल को वापस लेने में शक्तियों से बाहर जाकर काम किया था।

पटना हाई कोर्ट में एक नशीले पदार्थों के मामले के आरोपी की जमानत पर सुनवाई हुई। कोर्ट के स्टाफ से गलती हो गई। आदेश लिखते समय उसने गलती से 'रिजेक्टेड' की जगह 'अलाउड' लिख दिया। जब हाई कोर्ट को इस गलती का पता चला, तो उन्होंने अपना पिछला आदेश रद्द कर दिया और जमानत वापस ले ली। आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और आरोपी की जमानत बहाल कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार जब जज किसी आदेश पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तो उसे बदला नहीं जा सकता।

कानून (सीआरपीसी की धारा 362) कहता है कि कोर्ट अपने ही फैसले की समीक्षा नहीं कर सकता। वह सिर्फ छोटी-मोटी गणितीय या क्लर्क वाली गलतियों को सुधार सकता है, लेकिन पूरे फैसले को पलट नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह एक अजीब स्थिति है कि एक स्टाफ की गलती से जमानत मिल गई, लेकिन कानून के नियमों का पालन करना ज्यादा जरूरी है। कोर्ट अपनी शक्तियों से बाहर जाकर हस्ताक्षरित आदेश को रद्द नहीं कर सकता।


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