'Gen-Z की बात सुननी होगी, आवाज न सुनी जाए तो आंदोलन भी लोकतांत्रिक तरीका': मोहन भागवत

बड़ा बयान

Update: 2026-08-06 13:37 GMT
New Delhi. नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं की भूमिका, लोकतंत्र, शिक्षा व्यवस्था और संवाद की संस्कृति पर महत्वपूर्ण विचार रखते हुए कहा कि यदि किसी की आवाज नहीं सुनी जाती है तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना भी उचित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन समाज को जोड़ने और आम सहमति बनाने का माध्यम होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करने का। नई दिल्ली में आयोजित 'Gen-Z से संवाद' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए
मोहन भागवत
ने कहा कि लोकतंत्र में केवल चुनाव ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि संवाद, विचार-विमर्श और असहमति भी उसकी मजबूत नींव हैं। उन्होंने कहा कि जब किसी मुद्दे पर लोगों की बात नहीं सुनी जाती, तब आंदोलन भी संवाद का एक माध्यम बन जाता है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी विरोध या आंदोलन का उद्देश्य व्यवस्था में सुधार और समाधान होना चाहिए, न कि समाज को बांटना।
उन्होंने कहा, "लोकतंत्र में विरोध भी आम सहमति बनाने का एक तरीका है। अलग-अलग विचार सामने आते हैं और बातचीत के बाद सहमति बनती है। यदि किसी कारण से संवाद नहीं हो पाता या आवाज नहीं सुनी जाती, तो आंदोलन किया जा सकता है। लेकिन आंदोलन का उद्देश्य लोगों को जोड़ना और समाधान निकालना होना चाहिए।" कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने Gen-Z और Gen Alpha पीढ़ी की सोच पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक जिज्ञासु है और हर बात को तर्क की कसौटी पर परखना चाहती है। उन्होंने कहा कि जब उनकी पीढ़ी युवा थी, तब बड़े-बुजुर्गों की बात बिना सवाल किए स्वीकार कर ली जाती थी, लेकिन आज की पीढ़ी सवाल पूछती है और उसे तार्किक जवाब चाहिए।
उन्होंने कहा, "जब हम उनकी उम्र के थे तो बड़ों की बात मान लेते थे और सवाल नहीं करते थे। आज Gen-Z और Gen Alpha सवाल पूछते हैं। उन्हें तार्किक उत्तर और अपनापन चाहिए। यह बदलाव सकारात्मक है और लोकतंत्र की भावना के अनुरूप भी है।" मोहन भागवत ने भारतीय परंपरा में संवाद की संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिमी देशों में इसे 'डिबेट' कहा जाता है, जबकि भारतीय परंपरा में इसे 'शास्त्रार्थ' कहा जाता है। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों के माध्यम से सत्य तक पहुंचना होता है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग विचार और विरोधी मत मिलकर ही किसी विषय की संपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
उन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था पर भी चिंता जताई और कहा कि इसमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है। उनके अनुसार, हाल के समय में Gen-Z द्वारा शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठाए गए सवाल पूरी तरह उचित हैं। उन्होंने कहा कि यदि युवा शिक्षा व्यवस्था में कमियां महसूस कर रहे हैं और उन्हें सुधारने की मांग कर रहे हैं, तो उनकी बात गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि विरोध करना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन उसका तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। उन्होंने संविधान
निर्माताओं, विशेष
रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि विरोध और असहमति व्यक्त करने के लिए संविधान ने स्पष्ट रास्ते बताए हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन को संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर ही किया जाना चाहिए। अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि युवा केवल विरोध के लिए विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे व्यवस्था में मौजूद समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन का लक्ष्य किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ होना नहीं चाहिए, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में होना चाहिए। उन्होंने युवाओं से रचनात्मक सोच अपनाने और संवाद के माध्यम से सकारात्मक बदलाव लाने का आह्वान किया।
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