प्रधानमंत्री मोदी के गमछा लहराने का वीडियो, जमकर हो रही चर्चा
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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गमछा लहराने का एक वीडियो बिहार में राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बन गया है. शुक्रवार को प्रधानमंत्री जब मुजफ्फरपुर पहुंचे तो समर्थकों की भारी भीड़ और गूंजते नारे 'मोदी, मोदी' के बीच उन्होंने अपने माधुबनी प्रिंट वाले गमछे को हवा में लहराया. यही पल अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है.
दरअसल, मुजफ्फरपुर के मैदान में जैसे ही प्रधानमंत्री का हेलिकॉप्टर उतरा, हजारों समर्थकों ने उनका जोरदार स्वागत किया. गर्म और उमस भरे मौसम में भी भीड़ का जोश देखते हुए प्रधानमंत्री ने मुस्कुराते हुए गमछा लहराया और भीड़ की ओर हाथ जोड़कर अभिवादन किया.
वीडियो में देखा जा सकता है कि पीएम मोदी लगभग 30 सेकंड तक गमछा लहराते हुए भीड़ की ओर देखते रहे. इसके बाद वे छपरा रैली के लिए रवाना हो गए. इससे पहले अगस्त महीने में औंता-सिमरिया पुल के उद्घाटन के दौरान भी उन्होंने गमछा लहराकर लोगों का अभिवादन किया था.
गौरतलब है कि स्वतंत्रता दिवस सहित कई मौकों पर पीएम मोदी अपने पारंपरिक पहनावे में गमछा, सिर पर साफा या विशेष हेडगियर के जरिए लोक संस्कृति से जुड़ाव दिखाते रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी का यह छोटा सा इशारा दरअसल एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी देता है.
गमछा भारत के कई राज्यों विशेषकर बिहार और बंगाल में किसानों और मजदूर वर्ग का प्रतीक माना जाता है. यह मेहनतकश लोगों की पहचान है, जो खेतों में काम करते हैं या तपती धूप में रोज़गार की तलाश में निकलते हैं.
गमछे का उपयोग पसीना पोंछने, सिर पर बांधने, या धूप से बचाव के लिए किया जाता है. यही कारण है कि राजनीतिक रैलियों में यह अब एक प्रतीकात्मक वस्त्र बन चुका है. पीएम मोदी जब इसे हवा में लहराते हैं, तो वह सिर्फ भीड़ का अभिवादन नहीं करते बल्कि यह संदेश भी देते हैं कि वे जनता के आदमी हैं और किसानों-मजदूरों के साथ खड़े हैं.
ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार की कार्यशील आबादी का 53.2 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से जुड़ा है. राज्य में भूमिहीन मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों की संख्या भी काफी अधिक है. यही वर्ग चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है.
ऐसे में यदि एनडीए को तेजस्वी यादव-राहुल गांधी गठबंधन के सामने अपनी जमीन मजबूत रखनी है, तो उसे गांवों और किसानों तक पहुंच बनानी होगी. और इसमें प्रधानमंत्री का यह ‘गमछा लहराना’ सिर्फ एक इशारा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक राजनीतिक संकेत माना जा रहा है.