नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब देश में चुनावी प्रक्रिया को सख्त बनाने की कोशिश में हैं। इस कड़ी में उन्होंने एक बार फिर ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित करने की पैरवी की है। कानून की जरूरत को साबित करने के लिए ट्रंप ने भारत में होने वाले चुनाव में पारदर्शी तरीके की तारीफ भी की। साथ ही उन्होंने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का भी नाम लिया।

ट्रंप ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट शेयर करते हुए अमेरिकी चुनाव प्रणाली पर सवाल खड़े किए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पोस्ट में लिखा कि इस महीने की शुरुआत में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से एक बेहद अहम सवाल पूछा था। ट्रंप के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार ने पूछा था, “आप अमेरिका में बिना किसी वैध फोटो पहचान पत्र के चुनाव कैसे करवा सकते हैं?”
ट्रंप ने कहा कि भारत के पिछले चुनाव में लगभग 64.6 करोड़ मतदाताओं ने हिस्सा लिया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतने बड़े चुनाव में 1% से भी कम लोगों ने मेल के जरिए वोट डाला। इसके अलावा हर एक वोटर के लिए वैध फोटो पहचान पत्र दिखाना जरूरी था। ट्रंप ने इसका हवाला देते हुए कहा, “हमें ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को अभी पास करने की जरूरत है!”
‘सेव अमेरिका एक्ट’ का शाब्दिक अर्थ है अमेरिका को बचाना। यानी ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह कानून अमेरिका को बचाने के लिए बहुत जरूरी है। दरअसल कानून के जरिए अमेरिका में यह प्रावधान लाने की कोशिश है कि देश में बिना वैध पहचान पत्र के कोई भी वोट ना डाल पाए। इससे पहले वाइट हाउस ने भी इस कानून की वकालत की है। वाइट हाउस ने एक बयान में कहा है कि अमेरिका के चुनावों में फैसला सिर्फ अमेरिकी नागरिकों को करना चाहिए। वाइट हाउस ने कहा कि राष्ट्रपति अमेरिकी रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों से इस कानून को पास करने की अपील कर रहे हैं। वाइट हाउस ने यह दावा भी किया कि चुनावों की सुरक्षा के मामले में अमेरिका कई दूसरे देशों से पीछे है। वाइट हाउस ने इसके लिए भारत, ब्राजील, जर्मनी और कनाडा जैसे देशों का हवाला भी दिया।
बयान में कहा गया है कि भारत और ब्राजील में वोटर आईडी को बायोमेट्रिक डेटाबेस से जोड़ा जाता है। वहीं, अमेरिका में नागरिकता के लिए काफी हद तक खुद की ओर से दी गई जानकारी पर भरोसा किया जाता है। इसके अलावा जर्मनी और कनाडा में वोटों की गिनती के लिए कागजी बैलेट का इस्तेमाल होता है। दावे के मुताबिक, अमेरिका में बैलेट की सुरक्षा और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की प्रक्रिया को लेकर ऐसा कोई ठोस नियम नहीं हैं। वहीं डेनमार्क और स्वीडन में मेल से वोट डालने की सुविधा मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है, जो मतदान केंद्र पर जाकर वोट नहीं दे सकते। वहां चुनाव के बाद देर से पहुंचने वाले बैलेट को नहीं गिना जाता, जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं है।



 


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