Delhi दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें लखनऊ कोर्ट परिसर में सार्वजनिक रास्तों और यूटिलिटी वाली जमीन पर वकीलों द्वारा किए गए अवैध निर्माण और कब्जे से जुड़ी कार्यवाही को चुनौती दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिका खारिज कर दी और साथ ही अनधिकृत निर्माणों पर कब्जा जमाए वकीलों को शांतिपूर्वक खाली करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट आदिश अग्रवाल ने मांग की कि वकीलों को कोई वैकल्पिक जगह दी जाए। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि वकील सिर्फ एसोसिएशन में पद होने के आधार पर अनधिकृत ढांचों पर कब्जा बनाए रखने का दावा नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "आप मुख्य सड़क पर कब्जा करते हैं, कोर्ट परिसर के अंदर खुली जगह पर कब्जा करते हैं, अनधिकृत निर्माण करते हैं और फिर कहते हैं कि मैं एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया हूं, मैं गवर्निंग बॉडी का सदस्य हूं, और इसलिए मुझे वहां बने रहने का अधिकार है, ऐसा नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनधिकृत निर्माणों को हटाना होगा, क्योंकि ऐसे ढांचों ने सड़कों और ट्रैफिक में बाधा डाली है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, "सभी निर्माण तोड़े जाने हैं। मैंने खुद देखा है जब मैं वहां दो साल तक सीनियर जज था। मुझे पता है कि किस तरह के निर्माण हुए हैं, सड़कों में कैसे बाधा डाली गई है, ट्रैफिक पूरी तरह से बाधित है। तोड़फोड़ तो होनी ही है। जब अग्रवाल ने सुझाव दिया कि कोई वैकल्पिक जगह दी जा सकती है तो शीर्ष अदालत ने कहा, "आप जाकर वहां वकीलों के लिए कुछ जमीन खरीदें। राज्य सरकार से अनुरोध करें कि वे आपको इसके लिए कोई सोसाइटी उपलब्ध कराएं।
जब सीनियर वकील ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध किया तो बेंच ने इस सुझाव को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा, 'वकीलों के साथ मध्यस्थता! नहीं। याचिका खारिज,' और वकीलों को अनधिकृत ढांचे शांतिपूर्वक खाली करने की सलाह दी। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही के संदर्भ में आई थी, जो वकीलों और अन्य लोगों द्वारा इलाके में कथित तौर पर बनाए गए अनधिकृत चैंबरों और दुकानों से संबंधित थी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दर्ज किया था कि शुरू में 72 अतिक्रमणों की पहचान की गई थी, जिनमें से पहले चरण में केवल 14 को हटाया जा सका क्योंकि वकीलों ने कथित तौर पर बाधा और रुकावट पैदा की थी। 4 अगस्त को पारित अपने आदेश में हाई कोर्ट ने दर्ज किया कि उसके निर्देशों के बाद 100 से अधिक अवैध रूप से निर्मित चैंबरों को तोड़ा गया था, साथ ही यह भी कहा कि शुरू में पहचाने गए 72 अतिक्रमित चैंबरों/दुकानों में से केवल 14 को ही तोड़ा जा सका और बाकी ढांचों को वकीलों के विरोध-प्रदर्शन के कारण नहीं हटाया जा सका।
इसमें निर्देश दिया गया था कि बाकी 72 अतिक्रमणकारियों को या तो अपने चैंबर/दुकानों को खाली करने का या उन पर कब्जे के लिए वैध दावा पेश करने का एक और मौका दिया जाए। इसमें कहा गया था कि अगर वे ऐसा करने में नाकाम रहते हैं तो अवैध ढांचों को गिराया जा सकता है। यह कार्रवाई रविवार को करने का निर्देश दिया गया था ताकि न्यायिक कामकाज में कोई बाधा न आए। हाई कोर्ट ने लखनऊ के पुलिस कमिश्नर, जिला मजिस्ट्रेट और म्युनिसिपल कमिश्नर को भी निर्देश दिया था कि वे इस कार्रवाई में तालमेल बिठाएं और जरूरी प्रशासनिक व पुलिस सहायता उपलब्ध कराएं ताकि कानून-व्यवस्था की कोई समस्या पैदा न हो।
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