मुंबई: महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को आग में पूरी तरह जल चुकी BMW कार के मालिक को 70 लाख रुपये का बीमा क्लेम देने का निर्देश दिया है। आयोग ने कहा कि केवल इस आधार पर बीमा दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि टायर पंचर होने के बाद वाहन को सड़क किनारे रातभर बिना किसी व्यक्ति की निगरानी के छोड़ दिया गया था। बीमा कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि वाहन को वहां छोड़ने और उसमें आग लगने के बीच कोई सीधा संबंध था।

मामला सोलापुर निवासी रविकांत एस. पाटिल की BMW कार से जुड़ा है। उन्होंने अपनी कार का यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से बीमा कराया था। वाहन की बीमाकृत घोषित कीमत यानी Insured Declared Value (IDV) 70 लाख रुपये तय की गई थी। बीमा पॉलिसी 22 दिसंबर 2011 से 21 दिसंबर 2012 तक वैध थी और इसके लिए शिकायतकर्ता ने करीब 1.65 लाख रुपये का प्रीमियम चुकाया था।

रात में पंचर हुआ था BMW का टायर

मामले के अनुसार 8 मार्च 2012 की रात BMW कार का टायर हाईवे पर पंचर हो गया था। देर रात होने के कारण आसपास टायर ठीक करने की सुविधा या मैकेनिक उपलब्ध नहीं था। ऐसी स्थिति में ड्राइवर ने कार को सड़क के किनारे एक ढाबे के पास सुरक्षित स्थान पर खड़ा किया। कार की खिड़कियां बंद की गईं और वाहन को लॉक करने के बाद ड्राइवर दूसरे वाहन से सोलापुर लौट गया।

अगली सुबह जब कार के बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि उसमें आग लग चुकी थी और BMW पूरी तरह जलकर खाक हो गई थी। इसके बाद वाहन मालिक ने बीमा कंपनी के सामने क्लेम पेश किया। कार पूरी तरह नष्ट होने के कारण उन्होंने पॉलिसी में तय 70 लाख रुपये की IDV के आधार पर बीमा राशि मांगी।

बीमा कंपनी ने खारिज कर दिया था क्लेम

यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने जांच के बाद 23 नवंबर 2012 को बीमा दावा खारिज कर दिया। कंपनी ने पॉलिसी की एक शर्त का हवाला देते हुए कहा कि वाहन को बिना निगरानी के छोड़ दिया गया था और आगे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई।

बीमा कंपनी का तर्क था कि वाहन मालिक या ड्राइवर को कार के पास ही रुकना चाहिए था। इसके अलावा टायर बदलने या कार को किसी दूसरे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की कोशिश की जानी चाहिए थी। कंपनी ने इसी आधार पर इसे पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन मानते हुए भुगतान से इनकार कर दिया था।

आयोग ने बीमा कंपनी का तर्क किया खारिज

मामला महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के सामने पहुंचा। दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड को देखने के बाद आयोग ने बीमा कंपनी की दलील को स्वीकार नहीं किया।

आयोग ने माना कि पॉलिसी की संबंधित शर्त का अर्थ यह नहीं है कि खराब या दुर्घटनाग्रस्त वाहन को किसी भी परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। बीमाधारक ने उचित सावधानी बरती या नहीं, इसका फैसला उस समय की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

आयोग ने इस बात पर गौर किया कि घटना देर रात हुई थी। कार का टायर पंचर होने के बाद मौके पर मरम्मत की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ड्राइवर ने BMW को सड़क के किनारे एक ढाबे के पास खड़ा किया था। वाहन की खिड़कियां बंद थीं और उसे लॉक भी किया गया था।

आयोग ने यह भी माना कि रातभर खराब वाहन के अंदर ड्राइवर को बैठे रहने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं था। हाईवे पर खड़े वाहन में रात बिताने से सड़क दुर्घटना या आपराधिक घटना जैसे जोखिम भी हो सकते थे।

आग और वाहन छोड़ने के बीच संबंध साबित नहीं

फैसले का महत्वपूर्ण पहलू आग लगने के कारण से जुड़ा रहा। आयोग ने पाया कि कार में आग लगने का सटीक कारण निर्धारित नहीं हो पाया था। पुलिस पंचनामा और फायर ब्रिगेड की रिपोर्ट से भी ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि ड्राइवर के वहां मौजूद नहीं होने के कारण ही वाहन में आग लगी।

बीमा कंपनी की ओर से भी ऐसा कोई फोरेंसिक साक्ष्य पेश नहीं किया गया जिससे कार को रातभर सड़क किनारे छोड़ने और आग लगने की घटना के बीच सीधा संबंध स्थापित हो सके। आयोग ने बीमा कानून के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि पॉलिसी की किसी शर्त के कथित उल्लंघन के आधार पर दावा खारिज करने के लिए उस उल्लंघन और नुकसान के कारण के बीच सीधा संबंध होना जरूरी है।

₹59 लाख देने की दलील भी नहीं मानी

बीमा कंपनी ने यह तर्क भी दिया था कि मूल्यह्रास यानी डेप्रिसिएशन के बाद BMW की कीमत करीब 59 लाख रुपये मानी जानी चाहिए। आयोग ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया।

आयोग ने कहा कि जब बीमा कंपनी ने वाहन की IDV 70 लाख रुपये स्वीकार करके उसी राशि के आधार पर प्रीमियम लिया था तो टोटल लॉस की स्थिति में बिना उचित कानूनी आधार के बाद में इस मूल्य को एकतरफा कम नहीं किया जा सकता।

₹70 लाख पर 7 प्रतिशत सालाना ब्याज

आयोग ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को शिकायतकर्ता को 70 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। इस राशि पर बीमा क्लेम खारिज किए जाने की तारीख 23 नवंबर 2012 से वास्तविक भुगतान होने तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

इसके अलावा शिकायतकर्ता को हुई मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 50 हजार रुपये मुआवजा तथा कानूनी कार्यवाही पर हुए खर्च के लिए 25 हजार रुपये अलग से देने का निर्देश दिया गया है।

यह फैसला बीमा दावों में पॉलिसी की शर्तों की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण है। आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी आधार पर किसी क्लेम को खारिज करना पर्याप्त नहीं है। यदि बीमा कंपनी पॉलिसी की शर्त के उल्लंघन को नुकसान का आधार बनाती है तो उसे कथित उल्लंघन और वास्तविक नुकसान के बीच संबंध भी साबित करना होगा

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