मैरिटल रेप पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, 3 हफ्ते बाद होगी सुनवाई
मैरिटल रेप अपराध बनेगा या नहीं तीन हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई
Delhi दिल्ली: मैरिटल रेप यानी वैवाहिक रिश्ते में पत्नी की इच्छा के खिलाफ पति द्वारा यौन संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में लाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने अदालत के सामने इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मैरिटल रेप को अलग अपराध घोषित करने का फैसला संसद और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। सरकार के मुताबिक, अदालत को कानून बनाकर इसे अपराध की नई श्रेणी में शामिल नहीं करना चाहिए।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने की। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि शादी का मतलब महिला की व्यक्तिगत आजादी समाप्त होना नहीं है। साथ ही अदालत ने मौजूदा कानूनी व्यवस्था और पति के खिलाफ कार्रवाई की संभावनाओं को लेकर भी सवाल उठाए। मामले की अंतिम सुनवाई करीब तीन सप्ताह बाद होने की बात कही गई है।
क्या है मैरिटल रेप से जुड़ा विवाद?
पूरा विवाद उस कानूनी प्रावधान से जुड़ा है, जिसके तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा उसकी इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने को वर्तमान कानून में बलात्कार के अपराध से अलग रखा गया है। इसी व्यवस्था को मैरिटल रेप की कानूनी छूट कहा जाता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विवाह अपने आप में पति को पत्नी की इच्छा के खिलाफ संबंध बनाने का अधिकार नहीं देता। उनके मुताबिक, शादी के बाद भी महिला की सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अगर किसी पति द्वारा पत्नी के साथ जबरदस्ती की जाती है और उसे गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो केवल वैवाहिक रिश्ता होने के आधार पर पति को कानून से अलग नहीं रखा जाना चाहिए। वे चाहते हैं कि शादीशुदा महिलाओं को भी जबरन यौन संबंध के खिलाफ वही कानूनी सुरक्षा मिले, जो अन्य महिलाओं को उपलब्ध है।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार मैरिटल रेप को अलग से अपराध बनाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का कहना है कि ऐसा कदम विवाह संस्था और पति-पत्नी के रिश्ते पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। सरकार के अनुसार, शादी के भीतर यौन संबंधों से जुड़े मामलों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे मामलों में केवल आपराधिक कानून ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैवाहिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
केंद्र का मुख्य तर्क यह है कि किसी नए अपराध को परिभाषित करना और उसके लिए सजा तय करना विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए यह फैसला संसद के स्तर पर होना चाहिए, न कि अदालत के जरिए कानून की नई व्यवस्था तैयार करके।
सुप्रीम कोर्ट के सामने दो बड़े सवाल
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य रूप से दो कानूनी सवाल हैं। पहला, अगर मौजूदा कानून में मैरिटल रेप से जुड़ी छूट बनी रहती है, तो क्या ऐसी स्थिति में पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है? साथ ही अदालत यह भी देखेगी कि भारतीय न्याय संहिता यानी BNS में दी गई यह कानूनी छूट संविधान के अनुरूप है या नहीं।
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस कृत्य को मौजूदा कानून ने बलात्कार का अपराध नहीं माना है, क्या अदालत अपने फैसले के जरिए उसे अपराध घोषित कर सकती है? या फिर इसके लिए संसद को कानून में संशोधन करना होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा मामला
यह विवाद पहले 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा था। मामले की सुनवाई दो जजों की पीठ ने की थी, लेकिन दोनों न्यायाधीशों की राय अलग रही। जस्टिस राजीव शकधर ने मैरिटल रेप से जुड़ी कानूनी छूट को असंवैधानिक माना था। वहीं जस्टिस सी. हरिशंकर ने इस छूट को बरकरार रखने के पक्ष में फैसला दिया था। उनका तर्क था कि पति-पत्नी के रिश्ते को कानून में अलग तरीके से देखने के पीछे एक कानूनी आधार मौजूद है।
दोनों जजों की अलग-अलग राय के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब शीर्ष अदालत को यह तय करना है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था संविधान के अनुरूप है या नहीं और इस विषय में बदलाव की सीमा अदालत के अधिकार क्षेत्र में आती है या संसद के।
खर्चे का हिसाब मांगना क्रूरता नहीं- सुप्रीम कोर्ट
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का एक अन्य फैसला भी चर्चा में है। अदालत ने एक मामले में कहा कि अगर पति घर के आर्थिक फैसले खुद लेता है या पत्नी से खर्च किए गए पैसों का हिसाब पूछता है, तो केवल इस आधार पर इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह टिप्पणी दहेज उत्पीड़न और क्रूरता से जुड़े एक मामले को रद्द करते हुए की थी। अदालत का कहना था कि घरेलू खर्च से जुड़े मतभेद और हर वैवाहिक विवाद को अपने आप आपराधिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।