अमेरिका में भारतीय IT कर्मचारियों को झटका, Infosys, TCS और Wipro समेत 8 कंपनियों पर अमेरिकी कार्रवाई, लाखों भारतीयों की चिंता बढ़ी
नई दिल्ली: अमेरिकी सरकार ने Infosys, TCS, Wipro और HCLTech समेत 8 कंपनियों की PERM प्रक्रिया पर रोक लगाई है। इस फैसले से इन कंपनियों में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पहले से ही करीब 10 लाख भारतीय रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि, TCS का कहना है कि उसके PERM आवेदन बहुत कम रहे हैं, इसलिए कंपनी को अपने कामकाज पर बड़े असर की आशंका नहीं है।
अमेरिका में 8 कंपनियों की PERM प्रक्रिया पर रोक, भारतीय IT कर्मचारियों के लिए बढ़ी मुश्किल
अमेरिका में नौकरी कर रहे भारतीय IT पेशेवरों के लिए स्थायी निवास हासिल करने का रास्ता और कठिन हो सकता है। अमेरिकी सरकार ने Infosys, Tata Consultancy Services (TCS), Wipro, HCLTech, Cognizant, Capgemini, Microsoft और Adobe को PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया से निलंबित कर दिया है। इन आठ कंपनियों में चार भारतीय कंपनियां हैं।
अमेरिकी अधिकारियों ने इन कंपनियों पर वीजा और रोजगार से जुड़े नियमों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। इस फैसले के बाद संबंधित कंपनियों के विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। अधिकारियों के अनुसार, वर्ष 2009 से अब तक इन कंपनियों को एक लाख से अधिक लेबर सर्टिफिकेशन मिल चुके हैं।
1. क्या है PERM प्रक्रिया और क्यों है जरूरी?
PERM अमेरिका में नौकरी के आधार पर ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण शुरुआती चरण है। इसके तहत कंपनी को अमेरिकी श्रम विभाग को यह बताना होता है कि संबंधित पद के लिए उपयुक्त अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही, उसे यह भी साबित करना होता है कि किसी विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन या काम करने की परिस्थितियों पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
इन शर्तों को पूरा करने के बाद ही कंपनी ग्रीन कार्ड से जुड़ी अगली प्रक्रिया की ओर बढ़ सकती है। अमेरिकी श्रम विभाग के फैसले के अनुसार, संबंधित आठ कंपनियों के नए PERM आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। पहले से जमा किए गए और लंबित आवेदनों पर भी आगे की कार्रवाई रोक दी गई है।
2. अमेरिकी सरकार ने कंपनियों पर क्यों की कार्रवाई?
अमेरिकी सरकार का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए रोजगार और वीजा संबंधी नियमों का गलत इस्तेमाल किया। अधिकारियों का कहना है कि ऐसी गतिविधियों से अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसरों और वेतन पर असर पड़ा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इन कंपनियों ने 2009 से अब तक करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए। इस अवधि में उन्हें 2.30 लाख से ज्यादा H-1B वीजा भी मंजूर हुए। इसके अलावा, इन कंपनियों को एक लाख से अधिक स्थायी लेबर सर्टिफिकेशन मिले।
हालांकि, इस कार्रवाई का असर कितने कर्मचारियों पर पड़ेगा और रोक कितने समय तक जारी रहेगी, इस बारे में अमेरिकी सरकार ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी है।
3. भारतीय कर्मचारियों और उनके परिवारों पर क्या होगा असर?
PERM प्रक्रिया रुकने से H-1B वीजा पर काम कर रहे कर्मचारियों का मौजूदा वीजा अपने आप रद्द नहीं होगा। हालांकि, भविष्य में वीजा एक्सटेंशन या ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ाने वालों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसका असर खासकर उन विदेशी कर्मचारियों पर पड़ सकता है, जो अमेरिका में स्थायी रूप से बसने की योजना बना रहे हैं।
इस अनिश्चितता का असर परिवारों की योजनाओं पर भी पड़ सकता है। घर खरीदने, बच्चों की पढ़ाई, बचत और भविष्य में कहां रहना है, जैसे फैसले लेना मुश्किल हो सकता है।
4. करीब 10 लाख भारतीय ग्रीन कार्ड के इंतजार में
नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (NFAP) की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में लगभग 10 लाख भारतीय रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दिसंबर 2025 तक रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के कुल लंबित मामलों में भारतीय आवेदकों की हिस्सेदारी करीब 79 प्रतिशत थी।
रिपोर्ट में बताया गया है कि अलग-अलग देशों के लिए ग्रीन कार्ड की संख्या तय होने के कारण भारतीय आवेदकों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। NFAP के 2026 के अनुमानों के मुताबिक, जनवरी 2026 में प्रक्रिया शुरू करने वाले कुशल भारतीय पेशेवरों को अलग-अलग श्रेणियों में इतना इंतजार करना पड़ सकता है:
- EB-1: 4 से 5 साल
- EB-2: 179 साल
- EB-3: 38 साल
ये अनुमान हैं, किसी व्यक्ति को ग्रीन कार्ड मिलने की निश्चित तारीख नहीं। नियमों, उपलब्ध वीजा और लंबित आवेदनों की संख्या में बदलाव होने पर प्रतीक्षा अवधि भी बदल सकती है।
सितंबर 2026 के अमेरिकी वीजा बुलेटिन में भारतीयों के लिए EB-2 श्रेणी में वीजा उपलब्ध नहीं था। अक्टूबर 2026 के बुलेटिन में स्थिति बदली और उन आवेदकों की बारी आने की संभावना बनी, जिनकी प्राथमिकता तारीख 1 नवंबर 2013 से पहले की है। EB-3 श्रेणी में उन भारतीय आवेदकों की बारी थी, जिन्होंने 1 जनवरी 2014 से पहले आवेदन किया था।
5. TCS ने क्या कहा, कंपनियों की आगे की रणनीति क्या होगी?
TCS ने कहा है कि वह अमेरिकी श्रम विभाग के निर्देशों का पालन करेगी। कंपनी के मुताबिक, अमेरिका में उसकी भर्ती नीति स्थानीय कर्मचारियों को अवसर देने पर केंद्रित है। इसके लिए वह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से भी लोगों को नियुक्त करती है।
कंपनी ने बताया कि अमेरिका में उसके 31 कार्यालय और डिलीवरी सेंटर हैं, जहां बड़ी संख्या में स्थानीय कर्मचारी काम करते हैं। TCS अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 और लोगों को रोजगार देने की योजना बना रही है। कंपनी के अनुसार, पिछले दो वर्षों में उसके PERMआवेदन की संख्या एक अंक में रही है। इसी आधार परउसका मानना है कि नई रोक से उसकी भर्ती योजना और ग्राहकों के कामपर बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
दूसरी ओर, प्रभावित कंपनियां कानूनी विकल्प तलाश सकती हैं और अपने रोजगार संबंधी नियमों में जरूरी बदलाव कर सकती हैं। कुछ भारतीय पेशेवर दूसरे देशों में नौकरीखोजने या भारत लौटने पर भी विचार कर सकते हैं।
H-1B वीजा और PERM में अंतर: H-1B वीजा अमेरिका में तय शर्तों के तहत अस्थायी रूप से काम करने की अनुमति देता है, जबकि PERM रोजगार के आधार पर ग्रीन कार्ड पाने की शुरुआती प्रक्रिया है। नई रोक से इसी प्रक्रिया के आगे बढ़ने में बाधा आ सकती है।