Delhi दिल्ली: पाकिस्तान की सबसे ज्यादा निशाना बनने वाली सुरक्षा एजेंसी ही सबसे कम संसाधनों में काम करने को मजबूर है। यह स्थिति उस व्यवस्था की गंभीर तस्वीर पेश करती है, जिसमें पुलिसकर्मी कम वेतन, सीमित संसाधनों और लगातार खतरे के बीच काम कर रहे हैं। ऑनलाइन पत्रिका द डिप्लोमैट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों में खैबर पख्तूनख्वा में पुलिसकर्मियों का वेतन सबसे कम है। यह अस्थिर और आतंकवाद-प्रभावित क्षेत्र में वेतन असमानता को उजागर करता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि खैबर पख्तूनख्वा में एक कांस्टेबल को लगभग 69 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है, जबकि वहां के डिप्टी सुपरिटेंडेंट को 1,84,867 रुपये मिलते हैं। इसके विपरीत, बलूचिस्तान में एक डिप्टी सुपरिटेंडेंट का वेतन 4,53,727 रुपये है, जो लगभग ढाई गुना अधिक है। इसी असमानता को दूर करने के लिए खैबर पख्तूनख्वा के पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर क्षेत्र को ‘हार्ड एरिया’ घोषित करने की मांग की है। इसके लिए सालाना लगभग 2.2 अरब रुपये की आवश्यकता बताई गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 9 मई को खैबर पख्तूनख्वा के बन्नू जिले में पुलिस चौकी पर हुआ हमला, जिसमें 15 पुलिसकर्मी मारे गए थे, कोई अलग घटना नहीं थी। पिछले वर्ष पाकिस्तान में आतंकी हमलों में मारे गए 437 सुरक्षा कर्मियों में से 174 पुलिस बल के जवान थे, जो सबसे बड़ी संख्या थी। इनमें अधिकांश खैबर पख्तूनख्वा से थे। सुरक्षा और आतंकवाद मामलों के विशेषज्ञ आमिर हयात ने ‘द डिप्लोमैट’ में लिखा कि केवल बन्नू जिले में पुलिस पर 134 हमले हुए, जिनमें 27 घातक साबित हुए।
रिपोर्ट के अनुसार, मृतकों की सूची में लक्की मरवत, डेरा इस्माइल खान, करक, बाजौर और वाना जैसे कई जिलों के पुलिसकर्मी शामिल थे। रिपोर्ट में पाकिस्तान की न्यायिक प्रक्रिया की कमजोरी को भी उजागर किया गया है। इसमें कहा गया है कि खैबर पख्तूनख्वा की आतंकवाद निरोधक अदालतों में दर्ज 100 आतंकी हमलों के मामलों में केवल 17 मामलों में ही दोषसिद्धि हो पाती है, जबकि हजारों मामले अब भी जांच के अधीन हैं। राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद निरोधक अदालतों में 2,200 से अधिक मामले लंबित हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पेशावर की पुलिस लाइंस मस्जिद में हुए हमले को तीन साल बीत जाने के बाद भी मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। इस हमले में 84 नमाजियों की मौत हुई थी। आरोप है कि उसी पुलिस बल के एक कांस्टेबल ने आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार से दो लाख पाकिस्तानी रुपये लेकर हमले में मदद की थी। उसे 2024 के अंत में गिरफ्तार किया गया, लेकिन मामला अब भी ट्रायल से पहले के चरण में है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “बन्नू में इस सप्ताह जिन पुलिसकर्मियों को दफनाया गया, उन्हें उनके काम के मुकाबले कम वेतन मिला। राज्य का उन पर और उनकी जगह लेने वाले साथियों पर कम से कम इतना कर्ज है कि वह उनकी जान की वास्तविक कीमत को स्वीकार करे।”