SC में बहुविवाह चुनौती, केंद्र से चार हफ्ते में जवाब

Update: 2026-07-31 15:18 GMT

नई दिल्ली। मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह यानी एक से अधिक शादी की प्रथा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में मुस्लिमों के बीच बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा संविधान में दिए गए समानता और महिलाओं के अधिकारों के प्रावधानों का उल्लंघन करती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं जाकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज सहित अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस याचिका को पहले से लंबित अन्य संबंधित मामलों के साथ जोड़ दिया है।

याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह को मिली मान्यता को चुनौती दी गई है। इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह की अनुमति देता है, जबकि अन्य धर्मों के नागरिकों के लिए बहुविवाह कानूनन अपराध माना जाता है।

याचिका में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि बहुविवाह के मामले में सभी नागरिकों पर समान कानून लागू होना चाहिए और किसी भी व्यक्तिगत कानून के तहत विशेष छूट नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से बहुविवाह की प्रथा को समाप्त करने के लिए जरूरी कानूनी कदम उठाने की मांग की है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बहुविवाह की प्रथा महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को प्रभावित करती है। उनके अनुसार, इससे महिलाओं के साथ भेदभाव बढ़ सकता है और पारिवारिक सुरक्षा एवं सामाजिक स्थिरता पर असर पड़ता है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि इस तरह की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए समानता, भेदभाव से सुरक्षा और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के खिलाफ है।

याचिका में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कई अन्य मांगें भी रखी गई हैं। इसमें सभी मुस्लिम विवाहों और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण कराने की मांग शामिल है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विवाह का रिकॉर्ड होने से गुप्त रूप से किए जाने वाले दूसरे निकाह को रोकने में मदद मिलेगी।

इसके अलावा याचिका में पहली पत्नी और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसमें बहुविवाह से जुड़े मामलों में भरण-पोषण और कानूनी सहायता के लिए त्वरित व्यवस्था तैयार करने की बात कही गई है।

याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है, जिसमें मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का प्रावधान है। उनका कहना है कि कानून के सामने सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलना चाहिए और धर्म के आधार पर अलग-अलग नियम नहीं होने चाहिए।

गौरतलब है कि देश में व्यक्तिगत कानून और समान नागरिक संहिता को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। कई मामलों में अदालतें व्यक्तिगत कानूनों और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन पर विचार कर चुकी हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला आने के बाद केंद्र सरकार का जवाब महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केवल केंद्र से जवाब मांगा है। मामले में आगे की सुनवाई केंद्र सरकार के जवाब और अन्य संबंधित पक्षों की दलीलों के आधार पर होगी। अदालत का अंतिम फैसला आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की संवैधानिक स्थिति को लेकर क्या दिशा तय होती है।

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