नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि पुलिस अधिकारी के सामने आरोपी का कबूलनामा उसे नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में रखने का आधार नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) को हमेशा एक असाधारण उपाय माना गया है, इसलिए इसे बहुत सावधानी से और केवल उन बेहद दुर्लभ मामलों में ही लागू किया जाना चाहिए जहां हालात वास्तव में इसकी मांग करते हों।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने संभल में 2024 की सांप्रदायिक हिंसा में कथित भूमिका के लिए अक्टूबर 2025 में मुल्ला अफरोज के खिलाफ सख्त NSA लगाया था।

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा भरोसेमंद सबूत नहीं माना जाता और आमतौर पर इसे आरोपी के खिलाफ विचार में शामिल नहीं किया जाता, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा, "हमारी सोच यह है कि पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा, अकेले और किसी स्वतंत्र सबूत के समर्थन के बिना, प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को बनाए रखने के लिए ज़रूरी 'व्यक्तिगत संतुष्टि' का आधार नहीं बन सकता।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "ऐसा करने की इजाज़त देने का मतलब होगा कि हिरासत का आदेश ऐसी बुनियाद पर टिका हो जिसे कानून खुद शक की नज़र से देखता है और सबूत के तौर पर विचार से बाहर रखता है।"

कोर्ट ने कहा कि अगर हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने कबूलनामे के अलावा अन्य सबूतों पर भी भरोसा किया था, तो कोर्ट को यह पता लगाना होगा कि क्या उन अन्य सबूतों के आधार पर हिरासत को सही ठहराया जा सकता है।

मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हम फिर से कहते हैं कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के सिर्फ़ कबूलनामे (बिना किसी ठोस आधार या सबूत के) पर हिरासत का आदेश देने के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता। यह बात खासकर इस मामले में लागू होती है, जहां हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने लगातार कहा है कि उसका कबूलनामा धमकी और टॉर्चर के ज़रिए लिया गया था।"

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