Shimla. शिमला। मानसून की पहली तेज बारिश ने ही शिमला में जिला प्रशासन और नगर निगम के आपदा प्रबंधन के दावों की हकीकत सामने ला दी है। तीन साल से लगातार बरसात में भारी नुकसान झेलने के बावजूद संवेदनशील क्षेत्रों में आज तक स्थायी सुरक्षा कार्य नहीं हो पाए हैं। हालात यह हैं कि करोड़ों की योजनाएं और बैठकों के दावे फाइलों तक सीमित हैं, जबकि धरातल पर सुरक्षा व्यवस्था लगभग शून्य नजर आ रही है। शहर के कई हिस्सों में दरारों और भूस्खलन प्रभावित ढलानों को आज भी तिरपाल से ढककर बारिश से बचाने की कोशिश की जा रही है। मानसून शुरू होते ही रोजाना भूस्खलन और पेड़ों के गिरने की घटनाएं सामने आने लगी हैं।
कृष्णानगर के विष्णु मंदिर क्षेत्र में एक बार फिर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। यहां 2023 से आठ मकान खाली पड़े हैं और लोग बारिश का पानी जमीन में न रिसे, इसके लिए स्वयं तिरपाल बिछा रहे हैं। लवकुश चौक के निचले हिस्से, कुसुम्पटी की जीवणू कॉलोनी, लोअर पंथाघाटी, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, चलौंठी बाईपास, भट्टाकुफर, न्यू शिमला और खलीणी सहित कई क्षेत्रों में भी ढलानों और भवनों की नींव तिरपाल के सहारे सुरक्षित रखने की कोशिश की जा रही है। सर्कुलर रोड पर लिफ्ट के समीप सडक़ चौड़ीकरण के दौरान काटी गई पहाड़ी भी अब खतरा बन गई है, जिसे तिरपाल से ढकना पड़ा है। गर्मी के मौसम में जिला प्रशासन ने भूस्खलन और आपदा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों का सर्वे कराने और रिपोर्ट के आधार पर सुरक्षा योजना तैयार करने के निर्देश दिए थे, लेकिन मानसून शुरू होने के बावजूद न सर्वे रिपोर्ट सामने आई और न ही कोई ठोस कार्ययोजना। आपदा न्यूनीकरण के तहत करोड़ों रुपये के प्रस्ताव भी तैयार किए गए, लेकिन उनका असर जमीन पर कहीं दिखाई नहीं देता।