इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मंगलवार को कहा कि पानी पूरे क्षेत्र की ‘जीवन-रेखा’ है और इसका इस्तेमाल किसी देश पर दबाव बनाने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। उनका यह बयान भारत द्वारा स्थायी मध्यस्थता अदालत के हालिया आदेश को खारिज किए जाने के एक दिन बाद आया है। भारत ने साफ कहा है कि कथित रूप से ‘गैर-कानूनी तरीके से गठित’ इस संस्था को नई दिल्ली के संप्रभु फैसलों पर टिप्पणी करने या उन्हें चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौतों में शामिल रही है। दोनों देशों के बीच तनाव और कई युद्धों के बावजूद यह व्यवस्था दशकों तक जारी रही। हालांकि हाल के घटनाक्रमों के बाद संधि को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद काफी बढ़ गए हैं।
शहबाज शरीफ ने पानी के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लोगों के जीवन और भविष्य से जुड़ा विषय है। उन्होंने जोर दिया कि जल संसाधनों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान लंबे समय से सिंधु नदी प्रणाली से मिलने वाले पानी को अपनी कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताता रहा है।
शहबाज की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कानूनी तथा कूटनीतिक टकराव तेज हो गया है। स्थायी मध्यस्थता अदालत से जुड़े घटनाक्रम पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए उसकी वैधता और अधिकार क्षेत्र को ही स्वीकार करने से इनकार किया है।
भारत का कहना है कि यह संस्था ऐसी प्रक्रिया के तहत गठित की गई जिसे नई दिल्ली वैध नहीं मानती। भारतीय पक्ष ने स्पष्ट किया है कि ऐसी किसी संस्था के पास भारत के संप्रभु निर्णयों की समीक्षा करने या उन पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है। इसी आधार पर भारत ने संधि को लेकर दिए गए आदेश को मानने से इनकार किया है।
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं। सामान्य तौर पर पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज के पानी पर भारत को व्यापक अधिकार मिला जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया। भारत को पश्चिमी नदियों पर भी संधि में तय शर्तों के तहत कुछ उपयोग की अनुमति है।
दशकों तक यह संधि भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों के बीच भी कायम रही। हालांकि समय के साथ जलविद्युत परियोजनाओं, बांधों और पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच कई विवाद सामने आए। पाकिस्तान ने भारत की कुछ परियोजनाओं पर आपत्ति जताई जबकि भारत का कहना रहा है कि उसकी परियोजनाएं संधि के प्रावधानों के अनुरूप हैं।
हाल के वर्षों में भारत ने संधि की समीक्षा और उसमें बदलाव की जरूरत का मुद्दा भी उठाया है। नई दिल्ली का तर्क रहा है कि परिस्थितियां बदल चुकी हैं और कई ऐसे विषय सामने आए हैं जिन पर मौजूदा व्यवस्था में पुनर्विचार आवश्यक है। आतंकवाद और सीमा पार से होने वाली गतिविधियां भी दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में लगातार बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं।
मौजूदा विवाद में पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया पर जोर दे रहा है जबकि भारत ने मध्यस्थता अदालत की वैधता को लेकर आपत्ति जताई है। भारत का रुख है कि किसी भी कथित आदेश से उसके संप्रभु निर्णय प्रभावित नहीं हो सकते। इससे यह मामला केवल जल बंटवारे तक सीमित न रहकर अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि की व्याख्या से जुड़ा विवाद भी बन गया है।
पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी प्रणाली विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश का बड़ा कृषि क्षेत्र इसी पर निर्भर है। पंजाब और सिंध जैसे कृषि प्रधान इलाकों में सिंचाई के लिए सिंधु नदी तंत्र का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में सिंधु जल संधि में किसी भी बदलाव या अनिश्चितता को पाकिस्तान खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखता है।
भारत के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर और आसपास के क्षेत्रों में जलविद्युत उत्पादन तथा जल संसाधनों के उपयोग को लेकर भारत लंबे समय से अपने अधिकारों पर जोर देता रहा है। भारत का कहना है कि उसे संधि के तहत मिले अधिकारों का पूरा इस्तेमाल करने का अधिकार है।
शहबाज शरीफ का ताजा बयान इसी बढ़ते विवाद की पृष्ठभूमि में आया है। पानी को ‘जीवन-रेखा’ बताते हुए उन्होंने इसे दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं करने की बात कही है। उनके बयान को पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी चिंताओं को सामने रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी तरफ भारत का रुख स्पष्ट है कि वह उस मध्यस्थता प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करेगा जिसे वह कानूनी रूप से वैध नहीं मानता। नई दिल्ली ने अपने संप्रभु फैसलों में बाहरी हस्तक्षेप को खारिज करते हुए कहा है कि ऐसी संस्था को भारत के निर्णयों पर बोलने का अधिकार नहीं है।
अब इस विवाद में आगे की दिशा दोनों देशों के कूटनीतिक रुख पर निर्भर करेगी। सिंधु जल संधि दशकों से भारत-पाकिस्तान संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में रही है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका भविष्य नए सवालों के घेरे में है। शहबाज शरीफ के बयान और भारत के कड़े रुख से साफ है कि पानी को लेकर दोनों देशों के बीच यह विवाद फिलहाल समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा है।