New Delhi. नई दिल्ली। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पूरे देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े ही धूमधाम और श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों से लेकर घर-आँगन तक, हर जगह उत्साह और आस्था का रंग छाया हुआ है। श्रीकृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र के संयोग में हुआ था, इसलिए इस पर्व का विशेष महत्व है। आज देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और लड्डू गोपाल के श्रृंगार की तैयारियों ने भक्ति का अद्भुत माहौल बना दिया है।

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जन्माष्टमी का महत्व और पौराणिक मान्यता
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में कंस के अत्याचारों से धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए हुआ था। मान्यता है कि उनका जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, मध्य रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र में हुआ। यही कारण है कि हर वर्ष इस दिन को भक्तजन दिव्य उत्सव के रूप में मनाते हैं। जन्माष्टमी पर व्रत-पूजन करने से भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस दिन छप्पन भोग लगाने से श्रीकृष्ण विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं।
छप्पन भोग और विशेष पूजन की परंपरा
जन्माष्टमी की रात भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। इसमें मिठाइयों, फलों, माखन, मिश्री और दूध से बने व्यंजनों का विशेष स्थान होता है। मान्यता है कि माखन और दूध श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए भक्त इनसे निर्मित प्रसाद जरूर चढ़ाते हैं। पूजन विधि के अनुसार, भक्तजन पहले व्रत रखते हैं और रात्रि 12 बजे भगवान के जन्म के साथ ही व्रत का पारायण करते हैं। घरों और मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं, जिनमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का जीवंत चित्रण होता है।
लड्डू गोपाल का श्रृंगार और झूला सजाने की परंपरा
पूजा से पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराया जाता है और फिर फूलों व चंदन से उनका श्रृंगार किया जाता है। पीले वस्त्र पहनाना शुभ माना जाता है क्योंकि पीला रंग श्रीकृष्ण का प्रिय है। माथे पर चंदन का तिलक, गले में फूलों की माला और सिर पर मोरपंख मुकुट सजाकर भगवान को सुसज्जित किया जाता है।
श्रृंगार के बाद लड्डू गोपाल को झूले पर विराजमान किया जाता है। झूले को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। भक्त भजन-कीर्तन करते हुए भगवान को झुलाते हैं और “राधे-राधे”, “जय श्रीकृष्ण” और “जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है।
खीरे का डंठल काटने की परंपरा – नाल छेदन संस्कार
जन्माष्टमी की रात 12 बजे एक विशेष परंपरा निभाई जाती है जिसे ‘नाल छेदन’ कहा जाता है। पूजा में रखे गए खीरे को स्नान कराकर उसके डंठल को सिक्के से काटा जाता है। यह प्रतीक है कि जैसे शिशु के जन्म के समय नाल काटी जाती है, वैसे ही श्रीकृष्ण का जन्म माना जाता है। इसके बाद खीरे को हल्का चीरकर उसमें से लड्डू गोपाल की प्रतिमा निकालते हैं और जोर-जोर से “जय कन्हैया लाल की” का उद्घोष करते हैं।
मथुरा-वृंदावन में उत्सव का भव्य आयोजन
मथुरा, वृंदावन और गोकुल में जन्माष्टमी का उत्सव विशेष रूप से भव्य होता है। इस बार भी मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को आकर्षक रोशनी और फूलों से सजाया गया है। यहां हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से दर्शन के लिए पहुंचे। भजन-कीर्तन, रासलीला और श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी झांकियां भक्तों का मन मोह रही हैं। सोशल मीडिया पर भी मथुरा और वृंदावन से जुड़े वीडियो और तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं। इनमें मंदिरों की भव्यता, झांकियां और भक्तों की उमंग देखने को मिल रही है।
दिल्ली और अहमदाबाद के मंदिरों में भी विशेष कार्यक्रम
नई दिल्ली, अहमदाबाद और अन्य बड़े शहरों में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव जोरदार तरीके से मनाया जा रहा है। दिल्ली के इस्कॉन मंदिर और अहमदाबाद के इस्कॉन मंदिर में हजारों भक्तों ने एकत्र होकर भजन-कीर्तन किए और रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म महोत्सव मनाया।
भक्तिभाव में डूबे श्रद्धालु
जन्माष्टमी केवल एक पर्व ही नहीं बल्कि भक्तों और भगवान के बीच प्रेम का अद्वितीय संगम है। इस दिन श्रद्धालु उपवास, पूजा और कीर्तन के जरिए अपनी आस्था प्रकट करते हैं। भक्तों का मानना है कि जब आस्था चरम पर होती है तो भगवान स्वयं चमत्कारिक रूप में अपने भक्तों के सामने प्रकट होते हैं।
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