रिकांगपिओ। किन्नौर के मुख्यालय रिकांगपिओ में रामलीला का मंचन आधुनिकता के दौर में विलुप्त हो गया। रिकांगपिओ में 26 साल से रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन नहीं किया जा रहा है। हालांकि इलाके में रामलीला मैदान का नाम उस समय रामलीला के मंचन से पड़ा था। अब उस स्थान रामलीला मैदान को जिला प्रशासन ने सौंदर्यीकरण कर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पार्क के नाम से नामकरण किया है। उस समय रामलीला के किरदार निभाने वाले कलाकारों को मलाल है कि आज की पीढ़ी की इस तरह के आयोजनों में कोई रुचि नहीं है। रिकांगपिओ निवासी नेंजा राम (83) के अनुसार उन्होंने सबसे पहले किन्नौर में 1976 में रामलीला कला केंद्र बनाकर रिकांगपिओ मैदान से इसके मंचन की शुरुआत की थी। तभी से इस मैदान का नाम रामलीला मैदान पड़ा। 14 साल तक रामलीला में मंचन के दौरान उन्होंने रावण का रोल अदा किया था।
उन्होंने कहा कि उस समय रामलीला के कलाकारों का हुनर सिर चढ़ कर बोलता था। 1976 से 1990 तक 14 साल लगातार रामलीला का मंचन किया था। उस समय शिक्षक दयाल सिंह भगवान राम का किरदार, पूर्ण चंद लक्ष्मण, सीता माता का जगदीश शर्मा और हनुमान का किरदार शीशपाल गुप्ता निभाते थे। लोग रात दो बजे तक रामलीला देखते थे। पहली बार 1976 में 22 हजार रुपए की पोशाक सहित मुकुटों को मथुरा से खरीद कर लाया गया था। 1990 से रामलीला का कार्यभार गुरमीत नेगी के हवाले किया गया। गुरमीत नेगी (73) का कहना है कि 1990 से 1998 तक रामलीला का आयोजन किया गया। इसके बाद आधुनिकता की चकाचौंध में सभी घरों में टीवी शुरू हो गए और रामलीला मंचन का दौर खत्म हो गया।