पिता के इलाज के लिए कोर्ट का बड़ा फैसला

Update: 2026-06-30 11:34 GMT

दिल्ली:  हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक बेहद भावुक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें 17 साल के एक नाबालिग को अपने गंभीर रूप से बीमार पिता को बचाने के लिए लिवर का एक हिस्सा दान करने की अनुमति दी गई. कोर्ट ने यह आदेश इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS), वसंत कुंज को सभी कानूनी, नैतिक और मेडिकल नियमों का पालन करते हुए जल्द से जल्द ट्रांसप्लांट प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश के साथ दिया.

क्या है पूरा मामला

यह मामला एक नाबालिग लड़के की याचिका से जुड़ा है, जिसे उसकी मां के माध्यम से दिल्ली हाईकोर्ट में दायर किया गया था. लड़के ने ‘मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994’ के तहत अपने पिता उत्तम कुमार शॉ को लिवर का हिस्सा दान करने की अनुमति मांगी थी. पिता लंबे समय से क्रॉनिक लिवर डिजीज और हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं.

कानून और नियमों की स्थिति

भारत में मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 के तहत नाबालिगों द्वारा अंग दान पर सामान्य रूप से प्रतिबंध है. हालांकि, 2014 के नियम 5(3)(g) के तहत अत्यंत गंभीर और असाधारण परिस्थितियों में विशेष अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते कि संबंधित प्राधिकरण और सरकार इसकी मंजूरी दें.

सरकारी मंजूरी भी पहले से मौजूद

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताया कि उपराज्यपाल (LG) और सक्षम प्राधिकरण ने 29 जून 2026 को ही इस ट्रांसप्लांट के लिए अनुमति दे दी थी. इसके बाद मामला कोर्ट में अंतिम स्वीकृति के लिए आया.

कोर्ट ने क्यों दी अनुमति

कोर्ट ने पाया कि पिता की हालत बेहद गंभीर है और उनके जीवन को बचाने का एकमात्र विकल्प लिवर ट्रांसप्लांट ही है. परिवार के अन्य सदस्यों की जांच की गई, लेकिन केवल नाबालिग बेटा ही मेडिकल रूप से उपयुक्त पाया गया. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि लड़का लगभग साढ़े 17 साल का है, स्वस्थ है और बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से अपने पिता को लिवर दान करना चाहता है.

मानवीय आधार पर लिया गया फैसला

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए कहा कि इस स्थिति में अनुमति न देने पर मरीज की जान को खतरा हो सकता था. इसलिए मानवीय आधार पर यह फैसला जरूरी था.

अस्पताल करेगा जल्द सर्जरी

ILBS अस्पताल ने कोर्ट को आश्वासन दिया है कि आदेश का पालन करते हुए जल्द ही सर्जरी की तारीख तय की जाएगी और सभी मेडिकल प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया जाएगा.

निष्कर्ष

यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि कानून और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाते हुए अदालतें जीवन बचाने के लिए असाधारण परिस्थितियों में महत्वपूर्ण फैसले ले सकती हैं.

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