मुस्लमानों के वोट से जीती कांग्रेस लेकिन मुस्लिम नेता नहीं चाहिए
केरल में कांग्रेस ने मुसलमान को भी डीएमके की तरह किया दरकिनार...
पप्पू फरिश्ता
> मुस्लमानों की पार्टी बनी कांग्रेस अब चुनाव के उपरांत इसाइ को केरल का मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। केरल के मुस्लमान कांग्रेस पार्टी को वोट देकर अपने आपको ठगा महसूस कर रहे हैं। वोट मुस्लमानों का और राजपाट आते ही इसाइयों के हाथ में सत्ता।
तमिलनाड में चुनाव के पूर्व का गठबंधन पार्टनर डीएमके का साथ छोडक़र कांग्रेस ने गद्दारी का परिचय दिया। उसी तरह विगत 50 सालों से मुस्लिम समाज के साथ भी कांग्रेस पार्टी छलकपट, डराधमका कर मुस्लिम वोट प्राप्त करती आ रही है लेकिन मुस्लिम नेताओं को पचा नहीं पाती या यूं कहें कि मुस्लिम नेताओं को लगातार कांग्रेस पार्टी में उचित जगह नहीं मिलती है। इसका उदाहरण है कि वरिष्ठ मुस्लिम नेता एआर अंतुले का परिवार, सीके जाफर शरीफ का परिवार, पीएम सइद का परिवार, अब्दुल गनिखान का परिवार, मौसिना किदवई का परिवार, इमरान किदवई का परिवार, डॉ. शकिल का परिवार, सरफराज अहमद का परिवार, अहमद पटेल का परिवार और चाण्क्य गुलामनबी आजाद को पार्टी ने किस तरह से बेइज्जत कर दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका। सभी मुस्लिम नेताओं ने विगत 70 सालों से कांग्रेस पार्टी को सत्ता में बने रहने के लिए जीजान से मेहनत की और मुस्लिम समाज का कांग्रेस पार्टी को वोट दिलाते रहे। इन्हीं बातों को लेकर मुस्लिम लीग और केरल के यूडीएफ के बड़े पार्टनर मुस्लिम मजिलिस के नेता खुलकर केरल में घमासान मचा रहे। केरल में सरकार गठन और मुख्यमंत्री का चयन बिना लड़ाई झगड़े और पार्टी टूटने से बचाना कांग्रेस के लिए मुसीबत बन गई है।
विधानसभा चुनाव में केरलम के वामपंथी किले को ढहा कर कांग्रेस सत्ता तक पहुंचने में कामयाब रही। लेकिन पार्टी नेताओ में सीएम को लेकर मची होड़ के चलते वह अब तक सरकार का गठन नहीं कर सकी है। वहीं मुस्लिमों को वोट के लिए इस्तेमाल कर दरकिनार करने की कांग्रेस की पुरानी पालिसी एक बार फिर देखने को मिल रही है। कांग्रेस जिन राज्यों में भी सत्ता में है वहां वह मुस्लिमों के बदौलत ही सरकार बना सकी है और अब केरल में भी अगर वह सत्ता तक पहुंची है तो वह मुस्लिमों वोटों के बदौलत ही है. कांग्रेस को इस मुकाम तक पहुंचाने में राज्य की मुस्लीम परस्त पार्टी आईयूएमएल की बड़ी भूमिका है। बावजूद राज्य में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की जगह इसाई समुदाय से मुख्यमंत्री बनाने की कोशिशें हो रही हैं अभी जिन नेताओं के नाम मुख्यमंत्री के रेस में है वे सभी इसी समुदाय आते हैं। कांग्रेस हमेशा से ही खुद को मुस्लिम परस्त बताकर मुसलमानों का वोट हासिल करती है और सत्ता मिलते ही वह उसे दर किनार कर देती है। ऐसा ही आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में हुआ जहां मुसलमानों के वोट लेकर वह सत्ता तक पहुंची लेकिन किसी मुस्लिम नेता को सीएम या उप मुख्यमंत्री नहीं बनाया। अब केरल में भी मुसलमानों ने कांग्रेस को भर-भर के वोट दिये लेकिन परिणाम वहां भी यही रहा। राहुल गांधी केरल में इसाई मुख्यमंत्री की ताजपोशी की तैयारी कर रहे हैं। इससे मुसलमान एक बार फिर छले गए है। केरल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्ऱंट (यूडीएफ़) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। हालांकि सबसे बड़ी सफलता इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) को मिली। उसने 27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे जिनमें 22 पर जीत दर्ज की। यह आईयूएमएल की अब तक की सबसे बड़ी जीत है। 140 सीटों के लिए 9 अप्रैल को डाले गए वोटों की गिनती 4 मई को हुई, जिसमें सीपीएम के नेतृत्व वाले गठबंधन, लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ्ऱंट (एलडीएफ़) को बड़ा झटका लगा, जो पिछले दस साल से सत्ता में था। कांग्रेस ने 63 सीटें हासिल कीं, जबकि सत्तारूढ़ सीपीएम को सिफऱ् 26 सीटें मिलीं और सीपीआई ने 8 सीटें जीतीं। 1977 के बाद यह पहली बार है जब वामपंथी दल भारत के सभी राज्यों से सत्ता से बाहर हो गए हैं। केरल की एक अनोखी बात यह है कि आईयूएमएल।। सीपीएम और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे अहम राजनीतिक पार्टी है। कई दशकों से यह सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाती रही है और इस बार इसने इतिहास रच दिया है। इस योगदान के लिए आईयूएमएल को सरकार में सीएम न सही उप मुख्यमंत्री के दावे पर कायम रहना चाहिए।
मजिलिस के मुस्लिम नेता ने स्पष्ट कहा कि अगर मुस्लमानों को कांग्रेस पार्टी उचित हक नहीं देती है तो आने वाले सभी चुनाव पर मुस्लिम समाज कांग्रेस को वोट नहीं करने पर विचार कर सकता है।