इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Varanasi में घर गिराने पर लगाई रोक, नोटिस प्रक्रिया पर उठे सवाल
Prayagraj प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के दाल मंडी इलाके में स्थित एक मकान को गिराने की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश उस याचिका पर दिया गया, जिसमें वाराणसी नगर निगम द्वारा जारी नोटिस की वैधता को चुनौती दी गई थी।
मामले की सुनवाई जस्टिस नीरज तिवारी और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने की। याचिका सैयद अब्बास मुर्तजा शम्सी द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने अपने मकान को गिराए जाने की प्रस्तावित कार्रवाई पर आपत्ति जताई थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार, वाराणसी नगर निगम ने उनके मकान को जर्जर बताते हुए एक सप्ताह के भीतर उसे गिराने का निर्देश दिया था। हालांकि, उनके वकील SFA नकवी ने अदालत में दलील दी कि यह नोटिस कई स्तरों पर त्रुटिपूर्ण और अवैध है।
वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता के मकान संख्या 39/12 का नाम 30 जनवरी 2026 को जारी जर्जर भवनों की सूची में शामिल नहीं था। इसके बावजूद 15 अप्रैल 2026 को अचानक एक नोटिस जारी किया गया, जिसमें मकान को गिराने का आदेश दिया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि यह नोटिस एक मृत व्यक्ति, शमशु निशा बेगम, के नाम पर जारी किया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि जब नोटिस ही गलत व्यक्ति के नाम पर जारी हुआ है, तो पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से अमान्य हो जाती है।
अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद इस मामले में गंभीरता दिखाई और नगर निगम की कार्रवाई पर रोक लगा दी। साथ ही संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में किन नियमों का पालन किया गया।
मामले में यह भी कहा गया कि यदि किसी भवन को जर्जर घोषित किया जाता है, तो उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होता है, जिसमें उचित सर्वेक्षण, सूची में नाम शामिल करना और संबंधित व्यक्ति को सही तरीके से नोटिस देना शामिल है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और बिना पर्याप्त आधार के उनके मकान को गिराने की कार्रवाई शुरू कर दी गई। उन्होंने अदालत से इस कार्रवाई को रोकने और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की थी।
अदालत के इस आदेश के बाद फिलहाल मकान को गिराने की कार्रवाई पर रोक लग गई है। यह मामला प्रशासनिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और वैधानिकता को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है, और किसी भी प्रकार की त्रुटि होने पर न्यायिक हस्तक्षेप संभव है।