अंजनी कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
नई दिल्ली। पिछले दिनों लोकसभा में वक्फ के संशोधित बिल को पारित वक्फ संशोधन बिल को संसद के दोनों सदनों से पारित कराने के क्रम में पक्ष –विपक्ष के बीच तीखी नोक–झोंक देखने को मिली . लेकिन तमाम अवरोधों के बावजूद यह संसद की दहलीज़ लांघने में सफल हो गया। इस अहम् बिल को बीजेपी को सामाजिक और वैधानिक बदलावों में सहयोगी दलों के समर्थन प्राप्त हुआ। वक्फ विधेयक के पारित होने से सरकार के वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की दिशा में मंत्रालयों का आत्मविश्वास बढ़ा। इससे आर्थिक और शासन सुधार एजेंडे में सहयोगी दलों को शामिल करने की संभावना को बल मिला।
तो कुल मिलाकर एक लम्बे जद्दोजहद के बाद सालों से अटका वक्फ संशोधन बिल संसद के दोनों सदनों की दलहीज पार कर ही गया. बिल के पारित होने के बाद एनडीए में नए–नए राजनीतिक समीकरण भी बनते दिख रहे हैं। सभी राजनीतिक खेमों ने इस बात को बल मिला कि उक्त विधेयक को पारित कराना वह भी तब जब तीसरी बार मोदी सरकार चुनकर सत्ता में आई है उसे इसे सदनों से पारित कराने व इस मसले पर बहुमत जुटाने के लिए बीजेपी को अपने सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ेगा। यह केंद्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।
इसकी वजह है कि विधेयक के पारित होने से अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित मुद्दों के प्रति सहयोगी दलों की प्रदर्शित राजनीतिक संवेदनशीलता पर पारंपरिक गठबंधन की बढ़त समाप्त हो गई है। बीजेपी के सहयोगी दलों ने कभी भाजपा के मूल वैचारिक मुद्दों को गठबंधन के ठंडे बस्ते में डालकर वाजपेयी सरकार को एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम तक सीमित रहने के लिए मजबूर किया था। बीजेपी के सहयोगी दल, विशेषकर टीडीपी, जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) वही सहयोगी दल थे जिन्होंने मुस्लिम भावनाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का हवाला देकर भाजपा के मूल वैचारिक मुद्दों को गठबंधन के ठंडे बस्ते में डालकर वाजपेयी सरकार को एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम तक सीमित रहने के लिए मजबूर किया था।
क्यों महत्वपूर्ण है वक्फ विधेयक का पारित होना ?
यह बात सच है कि केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार ने वक्फ विधेयक को संसद की मुहर लगवाकर मुसलमानों के एक पक्ष को तो समझा लिया है कि इस संशोधित बिल में उनके लिए सरकार ने अच्छा सोचा है , अच्छे उपबंध जोड़े हैं पर दूसरी और मुसलमानों का एक वर्ग ऐसा भी है जिसने सडकों पर उतरकर प्रदर्शन का रास्ता चुन लिया है। वक्फ विधेयक को पारित कराकर केंद्र की सरकार के कदम को अनुच्छेद 370, यूसीसी और ट्रिपल तलाक के बराबर है) को आगे बढ़ाने का राजनीतिक महत्व, दूसरी मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और ट्रिपल तलाक को खत्म करने के विधेयकों को पारित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण देखा जा रहा है।