पश्चिम बंगाल: राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर वर्चस्व की लड़ाई तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद पार्टी में उठी अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आती दिख रही है। इसी बीच प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य के अचानक इस्तीफे ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। जानकारी के अनुसार, चंद्रिमा भट्टाचार्य ने सभी सांगठनिक पदों के साथ-साथ बैंक खातों के सिग्नेटरी पावर और चुनाव आयोग में पार्टी के प्रतिनिधित्व से भी इस्तीफा दे दिया है। वह हाल ही में मात्र एक महीने पहले ही प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त की गई थीं।
इस पूरे मामले का संबंध 15 जून को ममता बनर्जी द्वारा चुनाव आयोग को लिखे गए एक गोपनीय पत्र से जोड़ा जा रहा है। इस पत्र में ममता ने स्पष्ट किया था कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) की ओर से चुनाव आयोग के साथ किसी भी आधिकारिक संवाद, पत्राचार या संगठनात्मक फैसलों के लिए केवल दो नेता—अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओब्रायन—ही अधिकृत होंगे। ममता ने यह भी साफ लिखा था कि इनके अलावा कोई अन्य नेता पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का कानूनी अधिकार नहीं रखता।
इसी फैसले के सामने आने के बाद चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे को इससे जोड़कर देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि अपने अधिकार सीमित किए जाने से वह असंतुष्ट थीं। उन्होंने इस्तीफे में चुनाव आयोग में पार्टी प्रतिनिधित्व का भी उल्लेख किया है। पार्टी के भीतर इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग चर्चाएं चल रही हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि यह कदम संगठन को मजबूत करने और किसी भी समानांतर दावे को रोकने के लिए उठाया गया था, जबकि कुछ इसे आंतरिक असहमति का परिणाम बता रहे हैं।
इसी बीच विपक्षी खेमे के नेता रीतब्रत बनर्जी द्वारा दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात और 58 विधायकों के समर्थन के दावे ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ममता बनर्जी का यह कदम बागी धड़े को रोकने के लिए था, लेकिन इसका असर पार्टी के भीतर ही असंतोष के रूप में सामने आ गया। फिलहाल टीएमसी के अंदर जारी यह विवाद बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों की ओर इशारा कर रहा है।