कोलकाता। पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। राज्य के हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी छात्र का नामांकन नहीं है, लेकिन इसके बावजूद वहां बड़ी संख्या में शिक्षक तैनात हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 4133 स्कूलों में कोई छात्र नहीं पढ़ रहा, जबकि इन स्कूलों में करीब 19,502 शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इस स्थिति ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था, संसाधनों के इस्तेमाल और स्कूलों के प्रबंधन पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मामला सामने आने के बाद शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि जहां एक ओर कई इलाकों में छात्रों को बेहतर सुविधाओं और पर्याप्त शिक्षकों की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर बिना छात्रों वाले स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की तैनाती सरकारी संसाधनों के सही उपयोग पर सवाल खड़े करती है।
हजारों स्कूलों में शून्य नामांकन
जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में नामांकन की स्थिति की समीक्षा के दौरान यह आंकड़ा सामने आया। राज्य के 4133 स्कूलों में छात्रों की संख्या शून्य पाई गई। इसके बावजूद इन स्कूलों में शिक्षक और अन्य कर्मचारी तैनात हैं।
इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या करीब 19 हजार 502 बताई जा रही है। यानी बड़ी संख्या में शिक्षक ऐसे संस्थानों में कार्यरत हैं जहां वर्तमान समय में पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं हैं।
शिक्षा विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन स्कूलों का भविष्य क्या होगा और यहां तैनात शिक्षकों का किस तरह उपयोग किया जाए।
कम होते नामांकन की बड़ी वजह
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होने के पीछे कई कारण हैं। ग्रामीण इलाकों से लोगों का पलायन, निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या, सुविधाओं की कमी और अभिभावकों की बदलती सोच इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।
कई गांवों में आबादी कम होने के कारण स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घटती गई। कुछ जगहों पर परिवारों के दूसरे स्थानों पर चले जाने से भी सरकारी स्कूलों में नामांकन प्रभावित हुआ है।
इसके अलावा कुछ अभिभावक बेहतर अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं के कारण निजी स्कूलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम हो रही है।
शिक्षकों की तैनाती पर उठे सवाल
बिना छात्रों वाले स्कूलों में हजारों शिक्षकों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षकों की कमी वाले स्कूलों में इन शिक्षकों को तैनात किया जा सकता है, जिससे शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके।
कई सरकारी स्कूलों में आज भी विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी है। ऐसे में खाली पड़े स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती को लेकर सरकार को नई नीति बनाने की जरूरत बताई जा रही है।
हालांकि शिक्षक संगठनों का कहना है कि केवल छात्रों की संख्या के आधार पर शिक्षकों की भूमिका को नहीं देखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि स्कूलों को बंद करना या शिक्षकों का स्थानांतरण कई सामाजिक और प्रशासनिक पहलुओं से जुड़ा मामला है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल सरकार के सामने अब इन स्कूलों को लेकर फैसला लेना आसान नहीं होगा। एक तरफ खाली स्कूलों को संचालित करने में सरकारी धन खर्च हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्कूल बंद करने से स्थानीय स्तर पर विरोध की संभावना रहती है।
सरकार को यह तय करना होगा कि क्या इन स्कूलों का विलय किया जाए, शिक्षकों का पुनर्विन्यास किया जाए या फिर किसी अन्य उद्देश्य के लिए इन भवनों का इस्तेमाल किया जाए।
देश के कई राज्यों में कम नामांकन वाले स्कूलों को लेकर ऐसी समस्याएं सामने आती रही हैं। सरकारें अक्सर स्कूलों के विलय और शिक्षकों के स्थानांतरण जैसे कदम उठाती हैं, लेकिन इसमें स्थानीय लोगों की भावनाओं और जरूरतों का ध्यान रखना पड़ता है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों की जरूरत के अनुसार संसाधनों का सही इस्तेमाल भी जरूरी है। जहां बच्चों की संख्या अधिक है वहां पर्याप्त शिक्षक और सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।
बिना छात्रों वाले स्कूलों में लंबे समय तक शिक्षकों की तैनाती से सरकारी धन का प्रभावी उपयोग नहीं हो पाता। वहीं दूसरी ओर, जरूरत वाले क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी बनी रहती है।
आगे क्या कदम उठाएगी सरकार?
इस मामले के सामने आने के बाद अब शिक्षा विभाग की भूमिका अहम हो गई है। विभाग को स्कूलों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना होगा और उसके आधार पर निर्णय लेना होगा।
सरकार यदि इन स्कूलों के लिए ठोस योजना बनाती है तो इससे शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। शिक्षकों का बेहतर उपयोग, स्कूलों का पुनर्गठन और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।
फिलहाल पश्चिम बंगाल के 4133 स्कूलों में छात्रों की अनुपस्थिति और वहां तैनात 19,502 शिक्षकों का आंकड़ा शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए क्या कदम उठाती है।