देहरादून। नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और उससे हुई भारी तबाही के बाद उत्तराखंड सरकार ने भी आपदा प्रबंधन को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में ग्लेशियर झीलों की निगरानी को मजबूत करने और संवेदनशील क्षेत्रों में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने आपदा प्रबंधन विभाग को भविष्य में संभावित आपदाओं से निपटने के लिए वैज्ञानिक तरीके से तैयारी करने को कहा है।

गुरुवार को मुख्यमंत्री धामी ने आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन को इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि हिमालयी राज्य होने के कारण उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बनी रहती है। ऐसे में समय रहते खतरे की पहचान और प्रभावी तैयारी बेहद जरूरी है।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को राज्य की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का विस्तृत सर्वे कराने और उनका वैज्ञानिक अध्ययन करवाने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही झीलों की स्थिति, जलस्तर में बदलाव और संभावित खतरे को लेकर लगातार निगरानी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया है।

ग्लेशियर झीलों पर विशेष निगरानी के निर्देश

उत्तराखंड में बड़ी संख्या में ग्लेशियर और ग्लेशियर से बनी झीलें मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन और तापमान में बढ़ोतरी के कारण इन झीलों के आकार और जलस्तर में बदलाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियर झीलों में अचानक पानी बढ़ने से ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जैसी आपदाओं का खतरा पैदा हो सकता है।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि ऐसी सभी झीलों की पहचान की जाए, जो भविष्य में खतरा पैदा कर सकती हैं। इनका नियमित निरीक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण और आधुनिक तकनीक के माध्यम से निगरानी की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

उन्होंने कहा कि आपदा से पहले चेतावनी मिलने पर जनहानि और संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसलिए अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकता है।

संवेदनशील क्षेत्रों में लगेगा आधुनिक सिस्टम

मुख्यमंत्री ने राज्य के ऐसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली लगाने के निर्देश दिए हैं, जहां भूस्खलन, बाढ़, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अधिक रहता है। इस प्रणाली के माध्यम से मौसम में होने वाले बदलाव, जलस्तर में वृद्धि और संभावित खतरे की जानकारी समय रहते मिल सकेगी।

अर्ली वार्निंग सिस्टम से स्थानीय प्रशासन और राहत एजेंसियों को समय पर कार्रवाई करने में मदद मिलेगी। इससे प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत कार्यों को तेजी से शुरू करने में सहायता मिलेगी।

नेपाल की घटना से लिया सबक

नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों को सामने ला दिया है। अचानक आई बाढ़ से वहां बड़े स्तर पर नुकसान हुआ और कई क्षेत्रों में जनजीवन प्रभावित हुआ। इस घटना को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने भी अपनी तैयारियों की समीक्षा शुरू कर दी है।

उत्तराखंड और नेपाल दोनों ही हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियां काफी मिलती-जुलती हैं। ऐसे में नेपाल की घटना से सीख लेते हुए उत्तराखंड में आपदा जोखिम कम करने के उपायों को तेज किया जा रहा है।

वैज्ञानिक संस्थानों की ली जाएगी मदद

ग्लेशियर झीलों के अध्ययन और निगरानी के लिए वैज्ञानिक संस्थानों की मदद ली जाएगी। विशेषज्ञों के माध्यम से झीलों की स्थिति, खतरे की संभावना और बचाव के उपायों का अध्ययन कराया जाएगा।

सरकार का उद्देश्य केवल आपदा आने के बाद राहत कार्य करना नहीं, बल्कि आपदा से पहले ही जोखिम को कम करना है। इसके लिए तकनीक, वैज्ञानिक शोध और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है।

आपदा प्रबंधन को मजबूत करने की पहल

उत्तराखंड में पिछले वर्षों में कई बड़ी प्राकृतिक आपदाएं सामने आई हैं। केदारनाथ आपदा, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं ने राज्य में आपदा प्रबंधन की जरूरत को और बढ़ाया है। इसी को देखते हुए सरकार लगातार आधुनिक तकनीक और बेहतर तैयारी पर काम कर रही है।

मुख्यमंत्री धामी ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि आपदा प्रबंधन से जुड़े सभी कार्यों में तेजी लाई जाए और संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

नेपाल बाढ़ के बाद उठाए गए ये कदम उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। ग्लेशियर झीलों की निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली के जरिए राज्य भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी तैयारी मजबूत कर रहा है।

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